108 साल का इतिहास बदला: उर्स-ए-आला हजरत में पहली बार मटन बिरयानी नहीं मिलेगा शाकाहारी

उर्स-ए-आला हजरत शाकाहारी लंगर

बरेली। 108वें उर्स-ए-आला हजरत में इस बार एक ऐसा फैसला लिया गया है, जिसने वर्षों पुरानी परंपरा को नया आयाम दे दिया है। उर्स के 108 साल के इतिहास में पहली बार सभी जायरीन के लिए केवल शुद्ध शाकाहारी लंगर परोसा जाएगा। सावन माह में हिंदू समाज की धार्मिक भावनाओं का सम्मान करते हुए दरगाह प्रशासन ने यह निर्णय लिया है, जिसे अब जमात रजा-ए-मुस्तफा ने भी खुलकर समर्थन दे दिया है।

दरगाह प्रमुख हजरत सुब्हान रजा खान (सुब्हानी मियां) पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि इस वर्ष उर्स के दौरान सभी मेहमानों के लिए केवल शाकाहारी भोजन की व्यवस्था रहेगी। इसके बाद जमात रजा-ए-मुस्तफा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष एवं उर्स प्रभारी सलमान हसन खान ने सभी लंगर समितियों से अपील की है कि वे इस निर्णय का पूरी तरह पालन करें और व्यवस्था में किसी तरह की कमी न आने दें।

उर्स-ए-आला हजरत शाकाहारी लंगर: बदलनी पड़ी पूरी तैयारी, लाखों के ऑर्डर हुए रद्द

इस फैसले से लंगर समितियों को अंतिम समय में अपनी तैयारियां बदलनी पड़ीं। मांसाहारी भोजन और बिरयानी के लिए करीब एक माह पहले दिए गए लाखों रुपये के ऑर्डर रद्द करने पड़े। इसके साथ ही उन विशेष बावर्चियों की जगह नए रसोइयों की व्यवस्था करनी पड़ी, जिन्हें मांसाहारी व्यंजन बनाने के लिए बुलाया गया था। अब जायरीन को बिरयानी की जगह मटर-पनीर सहित शुद्ध शाकाहारी भोजन परोसा जाएगा।

उर्स-ए-आला हजरत शाकाहारी लंगर

सौहार्द और सम्मान का संदेश

उर्स के मीडिया प्रभारी नासिर कुरैशी ने बताया कि उर्स के इतिहास में पहली बार पूरी तरह शाकाहारी लंगर की व्यवस्था की जा रही है। उन्होंने कहा कि यह फैसला सामाजिक सौहार्द, आपसी सम्मान और गंगा-जमुनी तहजीब की भावना को और मजबूत करेगा।

व्यापारियों ने भी की सराहना

संयुक्त व्यापार मंडल के संयोजक विशाल मेहरोत्रा, शोभित सक्सेना, संजीव औतार अग्रवाल समेत कई व्यापारिक और सामाजिक संगठनों ने इस पहल का स्वागत करते हुए इसे धार्मिक सौहार्द और सामाजिक समरसता की मिसाल बताया। उनका कहना है कि यह निर्णय आपसी सम्मान और भाईचारे का सकारात्मक संदेश देगा।

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