नई दिल्ली। 12 जून 2025… अहमदाबाद एयरपोर्ट से उड़ान भरने के महज 32 सेकंड बाद आसमान में उठी एक चीख ने 260 जिंदगियों को हमेशा के लिए खामोश कर दिया था। एयर इंडिया की फ्लाइट AI-171 आग के गोले में तब्दील होकर मेडिकल कॉलेज के छात्रावास पर जा गिरी। चारों ओर धुआं, मलबा और मौत का मंजर था। लेकिन इसी तबाही के बीच एक शख्स जिंदा बाहर निकल आया। वह था विश्वासकुमार रमेश।

दुनिया ने कहा चमत्कार, विश्वासकुमार बोले- ‘हादसे से निकला हूं, खौफ से नहीं’

हादसे के बाद खून से सनी टी-शर्ट, हाथ में मोबाइल और चेहरे पर खौफ लिए मलबे से बाहर निकलते विश्वासकुमार की तस्वीर दुनिया भर में सुर्खियां बनी थी। लोग उन्हें चमत्कार कहने लगे, लेकिन एक साल बाद उन्होंने जो कहा, उसने उस चमत्कार के पीछे छिपे दर्द को उजागर कर दिया। 39 वर्षीय विश्वासकुमार रमेश ने कहा, “मैं जिंदा बच गया, लेकिन उस दिन की यादें आज भी मेरा पीछा नहीं छोड़तीं। लोग मेरी जिंदगी बचने की कहानी देखते हैं, लेकिन मेरे भीतर हर दिन एक नई लड़ाई चल रही है।”

हादसे की यादें आज भी जिंदा 

लंदन जा रही इस फ्लाइट में 242 लोग सवार थे। हादसे में विमान में मौजूद 241 यात्रियों और चालक दल के सदस्यों समेत कुल 260 लोगों की मौत हुई थी। जमीन पर मौजूद 19 लोग भी इस त्रासदी का शिकार बने। विश्वासकुमार इस भयावह हादसे के इकलौते जीवित गवाह हैं। इस हादसे ने उनसे सिर्फ सुकून नहीं छीना, बल्कि उनके भाई अजय की जान भी ले ली। रमेश बताते हैं कि एक साल बीतने के बाद भी उन्हें नींद नहीं आती, अचानक घबराहट होने लगती है और हादसे के भयावह दृश्य बार-बार आंखों के सामने घूम जाते हैं।

मानसिक आघात से जूझ रहे विश्वास, कानूनी मदद का सहारा 

उनके पारिवारिक सलाहकार संजीव पटेल के मुताबिक, विश्वासकुमार अभी भी इतने सदमे में हैं कि बिना सहारे घर से बाहर निकलना उनके लिए मुश्किल है। मानसिक आघात ने उनकी सामान्य जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया है। इस बीच, रमेश ने अपने अधिकारों और मुआवजे के लिए ब्रिटेन की एक कानूनी फर्म की सेवाएं ली हैं। वहीं एयर इंडिया ने कहा है कि कंपनी हादसे से प्रभावित सभी लोगों और परिवारों के साथ खड़ी है तथा उन्हें हरसंभव सहायता देने के लिए प्रतिबद्ध है।

एक साल बाद भी अहमदाबाद विमान हादसे के कई सवालों के जवाब तलाशे जा रहे हैं। लेकिन इस त्रासदी के इकलौते जीवित बचे विश्वासकुमार रमेश के लिए सबसे बड़ा सवाल आज भी यही है कि आखिर वह उस मौत के मंजर से तो निकल आए, लेकिन उसके खौफ से कब बाहर निकल पाएंगे।

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