नई दिल्ली। प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच में मुख्यमंत्री की मौजूदगी को लेकर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी ने राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। अदालत ने साफ कहा कि यदि कोई मुख्यमंत्री किसी केंद्रीय एजेंसी की जांच के दौरान मौके पर पहुंचकर हस्तक्षेप करता है, तो उसे ‘केंद्र बनाम राज्य’ का विवाद नहीं माना जा सकता। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से जुड़े इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने न सिर्फ कानूनी बहस को तेज कर दिया है, बल्कि केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों की सीमा को लेकर भी नई बहस छेड़ दी है। कोर्ट ने इस पूरे घटनाक्रम को एक व्यक्ति विशेष के कृत्य के रूप में देखा, न कि संघीय ढांचे के टकराव के तौर पर।
I-PAC छापे से शुरू हुआ विवाद, कोर्ट में पहुंची टकराव की कहानी
यह पूरा मामला 8 जनवरी को आई-पैक (I-PAC) कार्यालय में ईडी की छापेमारी से जुड़ा है। ईडी का आरोप है कि तलाशी के दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अपने वरिष्ठ नेताओं और पुलिस अधिकारियों के साथ वहां पहुंचीं और जांच प्रक्रिया में बाधा डाली। एजेंसी के मुताबिक, इस दौरान कुछ फाइलें और डिजिटल उपकरण मौके से हटा लिए गए, जिससे जांच प्रभावित हुई। इसके बाद पश्चिम बंगाल पुलिस ने ईडी अधिकारियों के खिलाफ तीन एफआईआर दर्ज कर दीं, जिन्हें ईडी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। कोर्ट ने पहले ही इन एफआईआर पर रोक लगा दी थी और राज्य सरकार को निर्देश दिया था कि सभी सीसीटीवी फुटेज और इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों को सुरक्षित रखा जाए। अब इस मामले में सुनवाई के दौरान अदालत ने जो टिप्पणी की, उसने पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है।
“यह व्यक्ति का कृत्य, न कि राज्य का अधिकार”: कोर्ट ने खारिज की दलील
सुनवाई के दौरान पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी और अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि यह मामला केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों का विवाद है, इसलिए इसे संविधान के अनुच्छेद 131 के तहत सुना जाना चाहिए, न कि अनुच्छेद 32 के तहत। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने इस तर्क को खारिज कर दिया। जस्टिस ने साफ कहा कि यह मामला राज्य के अधिकारों का नहीं, बल्कि एक व्यक्ति के कृत्य का है—जो संयोग से मुख्यमंत्री हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई मंत्री या मुख्यमंत्री जांच के दौरान पहुंचकर हस्तक्षेप करता है, तो उसे संघीय विवाद बताना उचित नहीं होगा। कोर्ट की इस टिप्पणी को कानूनी विशेषज्ञ काफी अहम मान रहे हैं, क्योंकि यह भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक स्पष्ट दिशा तय कर सकती है।
ईडी के गंभीर आरोप, “संविधान निर्माताओं ने ऐसी स्थिति की कल्पना नहीं की होगी”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट को बताया कि छापेमारी के दौरान कथित तौर पर आपत्तिजनक सामग्री भी मौके से हटाई गई थी। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि संविधान निर्माताओं ने शायद ऐसी स्थिति की कल्पना भी नहीं की होगी, जहां एक मौजूदा मुख्यमंत्री किसी एजेंसी की जांच में जाकर हस्तक्षेप करे। दूसरी ओर, राज्य सरकार ने यह भी तर्क दिया कि ईडी एक वैधानिक संस्था है और वह मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का हवाला देकर अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दाखिल नहीं कर सकती। उनका कहना था कि जांच करना कोई मौलिक अधिकार नहीं है और एजेंसी अपने कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान व्यक्तिगत अधिकार का दावा नहीं कर सकती। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की सुनवाई जारी है और आने वाले दिनों में इस पर बड़ा फैसला आ सकता है। इस पूरे प्रकरण ने कानून, राजनीति और प्रशासनिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक अहम बहस को जन्म दे दिया है।