बरेली। मनौना धाम से डेढ़ वर्षीय मासूम ऋषभ के अपहरण की गुत्थी सुलझाते-सुलझाते पुलिस ऐसे मानव तस्करी गिरोह तक पहुंच गई, जिसने पूरे सिस्टम को हिला दिया। जांच में खुलासा हुआ है कि एक मेडिकल कॉलेज में तैनात नर्स, दो फर्जी डॉक्टर और कई दलाल मिलकर नवजात बच्चों की खरीद-फरोख्त का संगठित नेटवर्क चला रहे थे। यह गिरोह न केवल बच्चों का अपहरण करता था, बल्कि अविवाहित गर्भवती युवतियों को गर्भपात न कराने और बच्चे बेचने के लिए पैसों का लालच भी देता था।
डेढ़ साल के ऋषभ के अपहरण से खुली परतें
24 मई को मनौना धाम से डेढ़ वर्षीय ऋषभ के अपहरण के बाद पुलिस ने योगेश कन्नौजिया और पवन सिंह को गिरफ्तार किया। पूछताछ में दोनों ने लखीमपुर निवासी उत्तम बाजपेई का नाम बताया। इसके बाद पुलिस की जांच आगे बढ़ी तो मानव तस्करी के पूरे नेटवर्क का पर्दाफाश हो गया।
60 हजार में हुई थी मासूम की डील
पुलिस के अनुसार, उत्तम बाजपेई ने योगेश और पवन से 60 हजार रुपये में बच्चे की चोरी की डील की थी। बाद में पूछताछ में पता चला कि वह सीतापुर निवासी संजय विश्वास और लखीमपुर खीरी के केशवराम उर्फ मंजेश के कहने पर काम कर रहा था। दोनों खुद को डॉक्टर बताते थे, लेकिन जांच में उनकी डिग्रियां और दावे संदिग्ध पाए गए हैं।
मेडिकल कॉलेज की नर्स बनी गिरोह की मास्टरमाइंड
जांच में सामने आया कि गिरोह की मुख्य संचालक सीता नाम की महिला है, जो एक मेडिकल कॉलेज के स्त्री एवं प्रसूति रोग विभाग में कार्यरत है। मूल रूप से बदायूं के दातागंज की रहने वाली सीता वर्तमान में मीरगंज क्षेत्र में रह रही है। पुलिस का दावा है कि बच्चों की खरीद-बिक्री की अधिकांश डील उसी के माध्यम से होती थी।
पांच लाख में तय हुई थी बच्चे की कीमत
पुलिस जांच में पता चला कि इस बार एक बच्चे को पांच लाख रुपये में बेचने की तैयारी थी। इसमें दलालों और गिरोह के अन्य सदस्यों का हिस्सा भी तय था। हालांकि बच्चे की उम्र अधिक होने के कारण सौदा पूरा नहीं हो सका और पूरी साजिश उजागर हो गई।
‘अबॉर्शन मत कराओ, बच्चा बेच दो’
पूछताछ में एक और चौंकाने वाला खुलासा हुआ। गिरोह अविवाहित गर्भवती युवतियों को गर्भपात न कराने की सलाह देता था। उन्हें नौ महीने तक गर्भ रखने और डिलीवरी के बाद बच्चे को बेचने के बदले मोटी रकम का लालच दिया जाता था। पुलिस को आरोपियों के मोबाइल फोन से कई गर्भवती महिलाओं की अल्ट्रासाउंड रिपोर्ट भी मिली हैं।
फर्जी कागजात बनाकर करते थे सौदे
गिरोह बच्चों को बेचने के बाद खरीदारों को फर्जी दस्तावेज भी उपलब्ध कराता था, जिससे सौदा कानूनी गोद लेने जैसा प्रतीत हो। पुलिस के अनुसार, सभी दस्तावेज पूरी तरह फर्जी थे और उनका किसी वैधानिक प्रक्रिया से कोई संबंध नहीं था।
215 कॉल और पैसों के लेनदेन ने खोले राज
सीता और उत्तम के मोबाइल फोन की जांच में पिछले चार महीनों में दोनों के बीच 215 से अधिक कॉल और कई वित्तीय लेनदेन के सबूत मिले हैं। पुलिस का मानना है कि यह नेटवर्क लंबे समय से सक्रिय था और अब तक कई बच्चों की खरीद-फरोख्त कर चुका है।
मोबाइल में मिले कई बच्चों के फोटो
आरोपियों के मोबाइल फोन से कई बच्चों की तस्वीरें बरामद हुई हैं। पूछताछ में गिरोह ने दो बच्चों को बेचने की बात स्वीकार की है, लेकिन पुलिस को आशंका है कि वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक हो सकती है। मामले में मानव तस्करी की धारा भी बढ़ा दी गई है और पुलिस अब गिरोह के अन्य सदस्यों तथा संभावित खरीदारों की तलाश में जुटी है।