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नई दिल्ली। बदलते युद्ध के दौर में भारत अपनी हवाई सुरक्षा को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाने जा रहा है। भारतीय वायुसेना अब ऐसा अत्याधुनिक रडार सिस्टम खरीदने की तैयारी में है, जो सैकड़ों किलोमीटर दूर से दुश्मन की मिसाइल, ड्रोन और लड़ाकू विमानों का पता लगा सके। खास बात यह है कि यह सिस्टम पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद से लॉन्च होने वाले खतरे को भी भारत की सीमा के भीतर से ट्रैक कर सकेगा।

450 किलोमीटर तक नजर, 40 KM ऊंचाई तक ट्रैकिंग

वायुसेना जिस नए लॉन्ग रेंज सर्विलांस रडार (LRSR) को खरीदने की योजना बना रही है, उसकी रेंज 450 किलोमीटर से ज्यादा होगी। यह रडार 40 किलोमीटर तक की ऊंचाई पर उड़ने वाले ऑब्जेक्ट—चाहे वह मिसाइल हो, ड्रोन हो या फाइटर जेट—को ट्रैक कर सकेगा। यानी अगर इस्लामाबाद से कोई ड्रोन या मिसाइल लॉन्च होती है, तो भारतीय रडार उसे समय रहते पहचानकर सुरक्षा तंत्र को अलर्ट कर देगा। मौजूदा सुरक्षा जरूरतों को देखते हुए यह क्षमता बेहद अहम मानी जा रही है।

मोबाइल सिस्टम, हर मौसम में काम करने की क्षमता

नया रडार सिस्टम एक मोबाइल प्लेटफॉर्म पर आधारित होगा, जिसे जरूरत के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर तैनात किया जा सकेगा। यह सिस्टम -40 डिग्री सेल्सियस से लेकर 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में काम करने में सक्षम होगा। साथ ही, यह 16,000 फीट तक की ऊंचाई पर भी प्रभावी तरीके से काम करेगा, जिससे हिमालयी सीमाओं पर निगरानी और मजबूत होगी। कठिन मौसम और भौगोलिक परिस्थितियों में भी इसकी कार्यक्षमता प्रभावित नहीं होगी।

4D फेज्ड ऐरे तकनीक से लैस होगा सिस्टम

इस रडार की सबसे बड़ी खासियत इसकी 4D फेज्ड ऐरे तकनीक होगी। यह सिस्टम न सिर्फ किसी ऑब्जेक्ट की दूरी और दिशा बताएगा, बल्कि उसकी गति और ऊंचाई का भी सटीक आकलन करेगा। इसके जरिए यह भी पता लगाया जा सकेगा कि आसमान में उड़ रही चीज किस प्रकार की है—फिक्स्ड विंग विमान, हेलीकॉप्टर या ड्रोन। इससे सुरक्षा एजेंसियों को तुरंत निर्णय लेने में मदद मिलेगी।

GaN टेक्नोलॉजी: तेज, शक्तिशाली और कम गर्मी

इस रडार में गैलियम नाइट्राइड (GaN) तकनीक का इस्तेमाल किया जाएगा। यह पारंपरिक सिलिकॉन तकनीक के मुकाबले ज्यादा तेज, ज्यादा शक्तिशाली और ऊर्जा के लिहाज से अधिक कुशल होती है। GaN आधारित सिस्टम कम गर्मी पैदा करते हैं और उच्च आवृत्ति पर काम करने में सक्षम होते हैं, जिससे रडार की परफॉर्मेंस और विश्वसनीयता दोनों बढ़ती है। यही वजह है कि आधुनिक रक्षा प्रणालियों में इसका तेजी से इस्तेमाल बढ़ रहा है।

360 डिग्री कवरेज और ‘फ्रेंड या फो’ पहचान

यह रडार 360 डिग्री कवरेज देने में सक्षम होगा, यानी चारों दिशाओं में एक साथ निगरानी रख सकेगा। इसके साथ ही इसमें IFF (Identification Friend or Foe) सिस्टम भी होगा, जो यह पहचान सकेगा कि आसमान में उड़ रहा ऑब्जेक्ट अपना है या दुश्मन का। इसके अलावा ड्रोन डिटेक्शन के लिए अलग X-बैंड रडार भी इस सिस्टम में शामिल किया जाएगा, जिससे छोटे और लो-फ्लाइंग टारगेट्स को भी आसानी से ट्रैक किया जा सकेगा।

1970 के दशक की तकनीक को मिलेगा रिप्लेसमेंट

भारतीय वायुसेना अभी भी कुछ ऐसे रडार सिस्टम का इस्तेमाल कर रही है, जो 1970 के दशक में शामिल किए गए थे। हालांकि समय-समय पर अपग्रेड किया गया, लेकिन अब उन्हें पूरी तरह बदलने की जरूरत महसूस हो रही है। मौजूदा हाई पावर स्टैटिक रडार की रेंज करीब 430 किलोमीटर है, लेकिन नई तकनीक के मुकाबले इसकी क्षमता सीमित हो चुकी है। ऐसे में नया LRSR सिस्टम रक्षा क्षमताओं में बड़ा बदलाव ला सकता है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद बढ़ी जरूरत

हाल के वर्षों में ड्रोन और मिसाइल आधारित हमलों का खतरा तेजी से बढ़ा है। पाकिस्तान के साथ टकराव के दौरान ‘ऑपरेशन सिंदूर’ में भी ड्रोन और मिसाइलों का व्यापक इस्तेमाल देखने को मिला। ऐसे में वायुसेना के लिए यह जरूरी हो गया है कि वह न सिर्फ दुश्मन के हमलों का जवाब दे, बल्कि पहले से उनकी पहचान कर उन्हें नाकाम भी कर सके। यही वजह है कि इस तरह के एडवांस रडार सिस्टम की जरूरत बढ़ गई है।

भारतीय कंपनियों को मिलेगा मौका

इस रडार प्रोजेक्ट के लिए वायुसेना ने 8 अप्रैल को ‘रिक्वेस्ट फॉर इन्फॉर्मेशन’ (RFI) जारी किया है, जिसमें सिर्फ भारतीय कंपनियों को भाग लेने का मौका दिया गया है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ पहल को भी बढ़ावा मिलेगा और देश की रक्षा तकनीक आत्मनिर्भर बनने की दिशा में आगे बढ़ेगी।

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