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अंकारा/तेल अवीव। मध्य-पूर्व की सियासत फिर बारूद के ढेर पर बैठी नजर आ रही है। Recep Tayyip Erdoğan और Benjamin Netanyahu के बीच जुबानी जंग अब रणनीतिक टकराव में बदलती दिख रही है। ‘ग्लोबल सुमुद फ्लोटिला’ हमले पर तुर्की की कानूनी कार्रवाई और इजरायल की ‘ईरान जैसा हाल’ करने की धमकी ने हालात को और भड़का दिया है। इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री Naftali Bennett द्वारा तुर्की को “नया ईरान” बताना आग में घी डालने जैसा साबित हुआ है। सवाल यही है—क्या दोनों देश सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहेंगे या फिर ये तनाव एक बड़े सैन्य टकराव में बदल सकता है?

 तेल, व्यापार और हवाई रास्तों पर वार… एर्दोगन के ‘इकोनॉमिक ब्रह्मास्त्र’ तैयार

तुर्की के पास सबसे बड़ा दबाव बनाने का हथियार आर्थिक मोर्चा है। Baku–Tbilisi–Ceyhan pipeline के जरिए अजरबैजान से इजरायल को जाने वाले तेल पर तुर्की प्रभाव डाल सकता है। माना जाता है कि यह सप्लाई इजरायल की ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा पूरा करती है। अगर यह लाइन प्रभावित होती है, तो इजरायल की अर्थव्यवस्था पर सीधा असर पड़ सकता है। इसके साथ ही तुर्की इजरायली विमानों के लिए अपना हवाई क्षेत्र बंद कर सकता है। इससे उड़ानों की लागत बढ़ेगी, रूट लंबा होगा और अंतरराष्ट्रीय कनेक्टिविटी प्रभावित होगी। व्यापार के मोर्चे पर भी तुर्की का दबदबा रहा है—स्टील, सीमेंट और निर्माण सामग्री की सप्लाई रोककर वह इजरायल के इंफ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को झटका दे सकता है। हालांकि यह कदम तुर्की की अर्थव्यवस्था को भी नुकसान पहुंचा सकता है, इसलिए अब तक ‘आंशिक रोक’ ही देखी गई है।

नाटो और कूटनीति का खेल… अंतरराष्ट्रीय मंच पर तुर्की की बड़ी चाल

तुर्की NATO का सदस्य है और यही उसकी सबसे बड़ी कूटनीतिक ताकत मानी जाती है। सिद्धांततः किसी सदस्य पर हमला पूरे गठबंधन पर हमला माना जाता है, लेकिन वास्तविकता इतनी सीधी नहीं है। इजरायल के पश्चिमी देशों से मजबूत रिश्ते तुर्की के लिए चुनौती बन सकते हैं। फिर भी एर्दोगन यूरोप, रूस, यूक्रेन और एशिया के बीच संतुलन बनाकर अपनी रणनीतिक स्थिति मजबूत करते रहे हैं। तुर्की की यही ‘मल्टी-डायरेक्शनल डिप्लोमेसी’ उसे किसी भी बड़े संघर्ष में सुरक्षा कवच दे सकती है। यूरोपीय संघ के साथ जटिल संबंधों के बावजूद, तुर्की खुद को क्षेत्रीय शक्ति के रूप में स्थापित कर चुका है। ऐसे में वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इजरायल के खिलाफ माहौल बनाने की कोशिश कर सकता है—हालांकि इसका असर सीमित ही रहने की संभावना है।

भूमध्य सागर में बढ़ता सैन्य दबाव… नौसेना, गैस फील्ड और गठबंधन का टकराव

Eastern Mediterranean अब इस टकराव का संभावित युद्धक्षेत्र बनता जा रहा है। तुर्की इस इलाके में अपनी नौसैनिक गतिविधियां बढ़ाकर इजरायल के गैस प्रोजेक्ट्स के करीब दबाव बना सकता है। तुर्की की नौसेना इस क्षेत्र की सबसे ताकतवर सेनाओं में गिनी जाती है, जबकि इजरायल भी पीछे नहीं है। उसके पास अत्याधुनिक पनडुब्बियां और ‘सी-डोम’ जैसी रक्षा प्रणाली है, जो समुद्र में तैनात होकर मिसाइल और ड्रोन हमलों को रोक सकती है। इधर, इजरायल ने Greece और Cyprus के साथ मिलकर एक मजबूत त्रिपक्षीय गठबंधन बना लिया है। इन देशों के साथ संयुक्त युद्धाभ्यास तुर्की की रणनीति को चुनौती देता है। अगर तुर्की क्षेत्रीय गुटों को समर्थन बढ़ाता है, तो इजरायल के लिए सुरक्षा खतरा और बढ़ सकता है। लेकिन इजरायल लंबे समय से ऐसे हालात के लिए तैयारी करता रहा है, जिससे सीधी जंग की स्थिति में मुकाबला बेहद खतरनाक और विनाशकारी हो सकता है।

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