मुंबई। महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बड़ा विवाद भड़क गया है। संजय गायकवाड़ पर आरोप है कि उन्होंने छत्रपति शिवाजी महाराज पर लिखी एक किताब के प्रकाशक को फोन पर जान से मारने और “जुबान खींच लेने” जैसी धमकी दी। आधी रात हुई इस बातचीत का ऑडियो सामने आते ही मामला तूल पकड़ गया है और अब एफआईआर से लेकर राजनीतिक कार्रवाई तक की मांग तेज हो गई है।
आधी रात फोन, 10 मिनट में बढ़ा विवाद का तापमान
आरोप है कि विधायक संजय गायकवाड़ ने रात 12:52 बजे प्रकाशक प्रशांत अंबी को फोन किया और करीब 9 से 10 मिनट तक बातचीत में आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल किया। किताब “शिवाजी कौन होता” के शीर्षक को लेकर नाराजगी जताते हुए उन्होंने कथित तौर पर कहा कि “जुबान खींच लेनी चाहिए” और ऐसी किताब को नष्ट कर देना चाहिए। इस बातचीत का ऑडियो सोशल मीडिया पर वायरल होते ही राजनीतिक हलचल तेज हो गई।
1988 की किताब पर 2026 में बवाल, लेखक का नाम फिर चर्चा में
यह विवाद जिस किताब को लेकर उठा है, वह मशहूर वामपंथी नेता गोविंद पानसरे द्वारा 1988 में लिखी गई थी। किताब कई वर्षों से अलग-अलग भाषाओं में प्रकाशित होती रही है और समाज में चर्चा का विषय रही है। लेकिन अब इसके शीर्षक और कंटेंट को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है।
ऑडियो वायरल, विधायक का सफाई वीडियो—‘छेड़छाड़ कर पेश किया गया’
ऑडियो वायरल होने के बाद संजय गायकवाड़ ने एक वीडियो जारी कर सफाई दी। उन्होंने माना कि बातचीत उन्हीं की है, लेकिन दावा किया कि ऑडियो को एडिट करके पेश किया गया है। उन्होंने कहा कि वह सिर्फ किताब के कंटेंट पर बहस कर रहे थे, लेकिन सामने वाले के जवाब से उकसकर उन्होंने आवेश में आकर अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया।
पुलिस स्टेशन में शिकायत, कई धाराओं में केस की मांग
विवाद बढ़ने के बाद प्रशांत अंबी अपने वकील असीम सरोदे के साथ कोल्हापुर के राजारामपुरी थाने पहुंचे। उन्होंने विधायक के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की कई धाराओं—आपराधिक धमकी, अपमान, दंगा भड़काने और मानहानि—के तहत केस दर्ज करने की मांग की है। फिलहाल पुलिस ने शिकायत ले ली है और कानूनी राय के बाद आगे की कार्रवाई की बात कही है।
सड़क पर उतरे कार्यकर्ता, शिवाजी चौक पर जोरदार प्रदर्शन
इस पूरे विवाद ने राजनीतिक रंग भी ले लिया है। छत्रपति शिवाजी चौक पर वामपंथी संगठनों और प्रगतिशील कार्यकर्ताओं ने जोरदार विरोध प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने विधायक के बयान को लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला बताया और कड़ी कार्रवाई की मांग की।
पानसरे परिवार और कांग्रेस का पलटवार
स्मिता पानसरे और मेघा पानसरे ने इस मामले में कड़ी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि अगर विधायक ने किताब का पूरा कंटेंट पढ़ा होता, तो उनकी भाषा इतनी आपत्तिजनक नहीं होती। वहीं हर्षवर्धन सपकाल ने मुख्यमंत्री से मामले की जांच और प्रकाशक को सुरक्षा देने की मांग की है।
शादी में बांटी गई थीं 500 कॉपियां, वहीं से पहुंची MLA तक
इस पूरे विवाद की शुरुआत भी दिलचस्प तरीके से हुई। प्रकाशक प्रशांत अंबी के मुताबिक, बुलढाणा में एक शादी समारोह में 500 कॉपियां मेहमानों में बांटने के लिए भेजी गई थीं। संभव है कि इन्हीं मेहमानों में विधायक की पत्नी को भी यह किताब मिली हो, जिसके बाद यह विवाद खड़ा हुआ।
बड़ा सवाल: क्या बहस की जगह अब धमकी?
यह मामला कई गंभीर सवाल खड़े करता है—
- क्या किसी किताब के कंटेंट पर असहमति जताने का तरीका धमकी देना है?
- क्या जनप्रतिनिधियों से ऐसी भाषा की उम्मीद की जा सकती है?
- क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर दबाव बढ़ रहा है?
इस विवाद ने न सिर्फ राजनीति बल्कि समाज में भी बहस छेड़ दी है।