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वॉशिंगटन। ईरान के साथ 39 दिन तक चले संघर्ष ने अमेरिका की सैन्य ताकत की एक बड़ी सच्चाई उजागर कर दी है। ताजा आकलनों के मुताबिक, इस जंग में अमेरिका ने अपने कई अहम मिसाइल सिस्टम का बड़ा हिस्सा खर्च कर दिया है। हालत यह है कि प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलों का करीब 45% जखीरा खत्म हो चुका है, जबकि THAAD और पैट्रियट जैसे एयर डिफेंस सिस्टम आधे रह गए हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर संघर्ष फिर से भड़कता है या लंबा चलता है, तो अमेरिका को हथियारों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

39 दिन की जंग ने खोला ‘स्टॉक’ का सच

28 फरवरी से शुरू हुए इस सैन्य अभियान में अमेरिकी सेना ने बड़े पैमाने पर मिसाइलों का इस्तेमाल किया। रिपोर्ट के मुताबिक, सात हफ्तों की लड़ाई में अमेरिका ने अपनी सटीक मार करने वाली मिसाइलों का लगभग आधा भंडार खर्च कर दिया। यह आंकड़ा अमेरिका जैसे सैन्य महाशक्ति के लिए भी चिंता का विषय माना जा रहा है।

THAAD और पैट्रियट: आधा हो गया एयर डिफेंस

अमेरिका की सबसे उन्नत एयर डिफेंस प्रणालियों में शामिल THAAD और पैट्रियट मिसाइलों का स्टॉक भी तेजी से घटा है।

  • THAAD मिसाइलों का करीब 50% जखीरा खत्म
  • पैट्रियट इंटरसेप्टर मिसाइलों का भी आधा हिस्सा खर्च

ये दोनों सिस्टम बैलिस्टिक मिसाइलों को रोकने के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं, खासकर ईरान जैसे देशों के खिलाफ।

टॉमहॉक से लेकर SM-6 तक—हर सिस्टम पर असर

इस संघर्ष का असर सिर्फ एयर डिफेंस तक सीमित नहीं रहा।

  • टॉमहॉक क्रूज मिसाइलों का 30% इस्तेमाल
  • जॉइंट एयर-टू-सरफेस स्टैंडऑफ मिसाइलों का 20% खत्म
  • SM-3 और SM-6 मिसाइलों का करीब 20% जखीरा घटा

यानी लंबी दूरी से सटीक हमले करने की क्षमता भी प्रभावित हुई है।

‘रीफिल’ में लगेंगे सालों—एक्सपर्ट की चेतावनी

सेंटर फॉर स्ट्रेटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज (CSIS) के विशेषज्ञों का कहना है कि इन हथियारों के भंडार को दोबारा भरने में 1 से 4 साल लग सकते हैं। वहीं, पूरी क्षमता तक पहुंचने में इससे भी ज्यादा समय लग सकता है। रक्षा विशेषज्ञ कर्नल मार्क कैन्सियन के मुताबिक, “मिसाइल और गोला-बारूद के स्टॉक को फिर से तैयार करने में कई साल लगेंगे, जो अमेरिका की रणनीतिक तैयारी को प्रभावित कर सकता है।”

उत्पादन बढ़ाने की कोशिश, लेकिन फायदा तुरंत नहीं

पेंटागन ने इस साल की शुरुआत में कई नए कॉन्ट्रैक्ट साइन किए हैं, ताकि मिसाइल उत्पादन बढ़ाया जा सके। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि उत्पादन क्षमता बढ़ने के बावजूद नई मिसाइलों की आपूर्ति में 3 से 5 साल का समय लगेगा। यानी मौजूदा स्थिति में अमेरिका को तुरंत राहत मिलने की संभावना कम है।

पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में बढ़ी चिंता

मिसाइल भंडार में आई कमी का असर सिर्फ मध्य-पूर्व तक सीमित नहीं है। इससे पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा संतुलन पर भी असर पड़ सकता है, जहां अमेरिका का मुकाबला चीन जैसी बड़ी ताकत से है। विश्लेषकों का मानना है कि अगर चीन के साथ किसी बड़े संघर्ष की स्थिति बनती है, तो अमेरिका को हथियारों की कमी का सामना करना पड़ सकता है।

क्या जंगबंदी टूटने पर बढ़ेगा खतरा?

8 अप्रैल से लागू हुई जंगबंदी फिलहाल स्थिति को नियंत्रित बनाए हुए है। लेकिन अगर यह सीजफायर टूटता है और फिर से संघर्ष शुरू होता है, तो अमेरिका के लिए चुनौती और बढ़ जाएगी। हालांकि विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि फिलहाल अमेरिका के पास अपने हितों की रक्षा करने के लिए पर्याप्त सैन्य क्षमता मौजूद है।

रणनीतिक असर: ‘महाशक्ति’ पर दबाव

इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में हथियारों की खपत कितनी तेजी से होती है। यह अमेरिका जैसी महाशक्ति के लिए भी एक चेतावनी है कि लंबी अवधि के युद्ध में लॉजिस्टिक्स और सप्लाई चेन कितनी अहम होती है। यह संघर्ष दिखाता है कि भविष्य के युद्ध सिर्फ ताकत से नहीं, बल्कि संसाधनों की उपलब्धता से भी जीते जाते हैं। मिसाइल स्टॉक, उत्पादन क्षमता और सप्लाई चेन—ये सभी अब युद्ध के अहम फैक्टर बन चुके हैं।

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