नई दिल्ली। लोकतंत्र के सबसे बड़े अधिकार—मतदान—को लेकर Supreme Court of India ने एक अहम और स्पष्ट टिप्पणी की है। शीर्ष अदालत ने दो टूक कहा है कि वोट देने का अधिकार और चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार नहीं हैं, बल्कि ये केवल वैधानिक अधिकार हैं, जिन्हें कानून के जरिए तय और नियंत्रित किया जाता है। इस टिप्पणी के बाद राजनीतिक और कानूनी गलियारों में नई बहस छिड़ गई है।
बेंच की सख्त टिप्पणी, पुराने सिद्धांत की दोहराई पुष्टि
जस्टिस B. V. Nagarathna और जस्टिस R. Mahadevan की पीठ ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट कहा कि “यह अच्छी तरह स्थापित सिद्धांत है कि न तो मताधिकार और न ही चुनाव लड़ने का अधिकार मौलिक अधिकार है।” अदालत ने अपने पूर्व के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि ये अधिकार संविधान के भाग-3 में शामिल मौलिक अधिकारों की श्रेणी में नहीं आते, बल्कि संसद द्वारा बनाए गए कानूनों से संचालित होते हैं।
वोट देना और चुनाव लड़ना—दो अलग अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान एक महत्वपूर्ण अंतर भी स्पष्ट किया। कोर्ट ने कहा कि मतदान का अधिकार लोकतांत्रिक प्रक्रिया में भागीदारी का माध्यम है, जबकि चुनाव लड़ने का अधिकार एक अलग और अधिक नियंत्रित प्रक्रिया है। अदालत के मुताबिक, चुनाव लड़ने के लिए उम्मीदवारों को कई शर्तों का पालन करना होता है—जैसे न्यूनतम आयु, नागरिकता, आपराधिक रिकॉर्ड, और अन्य वैधानिक योग्यताएं। इन सभी को कानून के तहत तय किया जाता है, जिससे चुनाव प्रक्रिया की शुचिता बनी रहे।
राजस्थान के मिल्क यूनियन विवाद से जुड़ा मामला
दरअसल, यह टिप्पणी राजस्थान के जिला दुग्ध उत्पादक सहकारी संघ (मिल्क यूनियन) के चुनावी नियमों से जुड़े एक विवाद की सुनवाई के दौरान आई। इन सहकारी संघों का संचालन राज्य के सहकारी कानूनों और बायलॉज के तहत होता है, जिनमें उम्मीदवारों की पात्रता और चुनावी प्रक्रिया के नियम तय किए जाते हैं। कुछ प्राथमिक सहकारी समितियों ने इन नियमों को चुनौती देते हुए Rajasthan High Court का रुख किया था। उनका तर्क था कि ये नियम अनुचित और कानून की सीमाओं से बाहर हैं।
हाई कोर्ट के फैसले पर सुप्रीम कोर्ट ने उठाए सवाल
हाई कोर्ट की सिंगल बेंच ने वर्ष 2015 में इन बायलॉज को रद्द कर दिया था, हालांकि पहले हुए चुनावों को वैध माना था। बाद में 2022 में डिवीजन बेंच ने भी इस फैसले को बरकरार रखा। लेकिन जब मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, तो शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के तर्कों पर असहमति जताई और रिट याचिकाओं की स्वीकार्यता पर भी सवाल खड़े किए। कोर्ट ने संकेत दिया कि इस तरह के मामलों में न्यायिक हस्तक्षेप सीमित होना चाहिए, खासकर तब जब अधिकार खुद वैधानिक हों।
कानून तय करता है चुनावी अधिकारों की सीमा
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि देश में चुनावी अधिकारों को कानून के जरिए परिभाषित किया गया है, जैसे—
Representation of the People Act, 1950 और Representation of the People Act, 1951
इन्हीं कानूनों के तहत यह तय होता है कि:
- कौन वोट देने का पात्र है
- कौन चुनाव लड़ सकता है
किन परिस्थितियों में किसी व्यक्ति को अयोग्य घोषित किया जा सकता है इसी तरह, सहकारी संस्थाओं और स्थानीय निकायों में भी राज्य के कानून और बायलॉज के आधार पर चुनावी नियम लागू होते हैं।
सरकार को शर्तें तय करने का अधिकार, लेकिन…
अदालत ने यह भी साफ किया कि चूंकि ये अधिकार मौलिक नहीं हैं, इसलिए सरकार इनके लिए उचित शर्तें और सीमाएं तय कर सकती है। हालांकि, अगर ये शर्तें मनमानी, भेदभावपूर्ण या संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ पाई जाती हैं, तो अदालत हस्तक्षेप कर सकती है।
फैसले के बाद छिड़ी नई बहस
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी ने चुनावी सुधार, उम्मीदवारों की योग्यता और मताधिकार की प्रकृति को लेकर नई बहस को जन्म दे दिया है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यह फैसला भविष्य में चुनावी कानूनों और नीतियों को प्रभावित कर सकता है।