नई दिल्ली/वॉशिंगटन। भारत की वायु शक्ति को लेकर वैश्विक स्तर पर एक बार फिर रणनीतिक खींचतान तेज हो गई है। जहां एक तरफ भारतीय वायुसेना को 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ लड़ाकू विमानों की जरूरत है, वहीं अमेरिका भारत को 4.5 जेनरेशन के F-15EX Eagle II का ऑफर दे रहा है। सवाल उठ रहा है—क्या यह सिर्फ एक डिफेंस डील है या इसके पीछे कोई बड़ी रणनीतिक चाल छिपी है? इसी बीच Dassault Rafale को लेकर चल रही चर्चा और सोर्स कोड विवाद ने इस बहस को और गर्म कर दिया है।
एयर चीफ की उड़ान और उठे बड़े सवाल
हाल ही में भारतीय वायुसेना प्रमुख एयर चीफ मार्शल एपी सिंह ने अमेरिका के नेवादा स्थित नेलिस एयर फोर्स बेस पर F-15EX में एक परिचय उड़ान भरी। इस उड़ान के बाद यह चर्चा तेज हो गई कि क्या भारत अमेरिकी फाइटर जेट्स की ओर झुकाव दिखा रहा है? हालांकि रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यह उड़ान केवल “इंटरऑपरेबिलिटी” और सैन्य सहयोग को मजबूत करने का हिस्सा हो सकती है। भारत और अमेरिका के बीच इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी लगातार बढ़ रही है, ऐसे में इस तरह की गतिविधियां सामान्य मानी जाती हैं।
राफेल डील और अटका ‘सोर्स कोड’ का पेंच
भारत ने पहले MMRCA डील के तहत 126 फाइटर जेट खरीदने की योजना बनाई थी, जिसमें राफेल को चुना गया था। लेकिन टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और सोर्स कोड को लेकर मतभेद के चलते यह सौदा आगे नहीं बढ़ सका। बाद में 2016-18 के बीच भारत ने 36 राफेल विमानों की डील की। आज राफेल भारतीय वायुसेना का सबसे भरोसेमंद और अत्याधुनिक फाइटर जेट माना जाता है। लेकिन भारत की रणनीति साफ है—अब वह सिर्फ खरीद नहीं, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत तकनीक भी चाहता है।
अमेरिका की पेशकश: F-35 नहीं, F-15EX क्यों?
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब भारत को 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर की जरूरत है, तो अमेरिका F-35 Lightning II की बजाय F-15EX क्यों ऑफर कर रहा है? रक्षा विश्लेषकों के मुताबिक इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं: F-35 बेहद संवेदनशील तकनीक वाला विमान है, जिसे अमेरिका सीमित देशों को ही देता है टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर अमेरिका बेहद सख्त है भारत की रूस के साथ रक्षा साझेदारी (जैसे Sukhoi Su-30MKI) भी एक बड़ा कारण हो सकती है इसलिए अमेरिका एक “कम संवेदनशील” लेकिन शक्तिशाली विकल्प के तौर पर F-15EX पेश कर रहा है।
F-15EX: ताकतवर लेकिन ‘स्टील्थ’ नहीं
F-15EX को 4.5 जेनरेशन का एडवांस फाइटर माना जाता है। इसमें लंबी दूरी तक भारी हथियार ले जाने की क्षमता है और यह मल्टी-रोल ऑपरेशन में सक्षम है। लेकिन इसमें स्टील्थ तकनीक नहीं है, जो आधुनिक युद्ध में बेहद अहम मानी जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि:
- F-15EX की भूमिका काफी हद तक Su-30MKI जैसी हो सकती है
- भारत के पास पहले से ही भारी संख्या में Su-30MKI मौजूद हैं
- ऐसे में F-15EX खरीदने से कोई बड़ा रणनीतिक फायदा नहीं मिलेगा
क्या अमेरिका ‘सोर्स कोड विवाद’ का फायदा उठा रहा?
राफेल को लेकर सोर्स कोड विवाद अभी भी चर्चा में है। फ्रांस इस संवेदनशील तकनीक को साझा करने से हिचक रहा है। ऐसे में माना जा रहा है कि अमेरिका इसी मौके का फायदा उठाकर अपना F-15EX भारत को ऑफर कर रहा है। कुछ रक्षा विशेषज्ञ इसे “डिप्लोमैटिक गेम” भी मानते हैं— जहां एक तरफ फ्रांस के साथ डील में अड़चन है, वहीं अमेरिका खुद को एक वैकल्पिक सप्लायर के रूप में पेश कर रहा है।
भारत का फोकस: स्टील्थ और स्वदेशी ताकत
भारतीय वायुसेना का फोकस अब स्पष्ट है—
- 5वीं पीढ़ी के स्टील्थ फाइटर
- स्वदेशी तकनीक का विकास
- लंबी दूरी की मिसाइल क्षमता
भारत पहले ही Su-30MKI में ब्रह्मोस मिसाइल के इंटीग्रेशन पर काम कर रहा है। इसके अलावा हाइपरसोनिक मिसाइल प्रोग्राम भी तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे में F-15EX जैसे प्लेटफॉर्म पर अरबों डॉलर खर्च करना रणनीतिक रूप से लाभदायक नहीं माना जा रहा।
क्या भारत खरीदेगा F-15EX?
मौजूदा हालात को देखते हुए इसकी संभावना बेहद कम नजर आती है।
- वायुसेना पहले ही राफेल को प्राथमिकता दे चुकी है
- MRFA प्रोग्राम में कई विकल्प मौजूद हैं
- स्टील्थ टेक्नोलॉजी की जरूरत प्राथमिक है
इसलिए F-15EX सिर्फ एक “ऑप्शन” बनकर रह सकता है, न कि अंतिम चुनाव।
निष्कर्ष: डील से ज्यादा ‘रणनीतिक संदेश’
राफेल बनाम F-15EX की यह बहस सिर्फ फाइटर जेट की तुलना नहीं है, बल्कि वैश्विक रणनीति का हिस्सा है। अमेरिका, फ्रांस और अन्य देश भारत के बड़े डिफेंस मार्केट में अपनी जगह बनाना चाहते हैं। लेकिन भारत अब पहले जैसा खरीदार नहीं रहा— वह तकनीक, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक रणनीति को प्राथमिकता दे रहा है। यानी साफ है— भारत अब सिर्फ विमान नहीं, ‘भविष्य की ताकत’ खरीदना चाहता है।