नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और डिजिटल तकनीक के तेजी से बढ़ते दौर में डेटा सेंटरों की मांग लगातार बढ़ रही है। इसी बीच चीन ने तकनीक के क्षेत्र में बड़ा कदम उठाते हुए समुद्र के नीचे दुनिया का पहला ग्रीन एनर्जी आधारित डेटा सेंटर शुरू किया है। शंघाई के तट के पास स्थापित इस परियोजना को डेटा सेंटर उद्योग में बड़ी क्रांति माना जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह मॉडल भविष्य में भारत जैसे देशों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है।
चीन का यह 24 मेगावाट क्षमता वाला डेटा सेंटर शंघाई के लिंगांग क्षेत्र में समुद्र तट से करीब 16 किलोमीटर दूर और समुद्र की सतह से 10 मीटर नीचे स्थापित किया गया है। इस परियोजना को हाईक्लाउड टेक्नोलॉजी और सरकारी कंपनी चाइना कम्युनिकेशंस कंस्ट्रक्शन ने मिलकर विकसित किया है। इसकी लागत करीब 238 मिलियन डॉलर यानी लगभग 2,200 करोड़ रुपये बताई जा रही है।
कूलिंग के लिए नहीं चाहिए साफ पानी
पारंपरिक डेटा सेंटरों में सर्वर लगातार गर्म होते हैं, जिन्हें ठंडा रखने के लिए बड़ी मात्रा में पानी और बिजली की जरूरत पड़ती है। कई डेटा सेंटरों में कुल बिजली खपत का 25 से 40 प्रतिशत हिस्सा केवल कूलिंग सिस्टम में खर्च होता है। चीन का यह अंडरवॉटर मॉडल समुद्र के ठंडे पानी का प्राकृतिक रूप से उपयोग करता है, जिससे अलग से कूलिंग की आवश्यकता लगभग समाप्त हो जाती है।
बिजली और जमीन की भी बड़ी बचत
रिपोर्ट के अनुसार यह डेटा सेंटर जमीन पर बने सामान्य डेटा सेंटरों की तुलना में करीब 22.8 प्रतिशत कम बिजली खर्च करता है। वहीं 95 प्रतिशत से अधिक ऊर्जा पवन ऊर्जा जैसे स्वच्छ स्रोतों से प्राप्त की जा रही है। समुद्र के भीतर स्थापित होने से जमीन की जरूरत भी 90 प्रतिशत से अधिक कम हो गई है।
भारत के लिए बड़ा अवसर
भारत में भी डेटा सेंटर सेक्टर तेजी से विस्तार कर रहा है। मुंबई, चेन्नई, नोएडा और बेंगलुरु जैसे शहरों में बड़े पैमाने पर डेटा सेंटर विकसित किए जा रहे हैं। रिलायंस और अडानी समूह भी इस क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश कर रहे हैं। भारत के पास 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी समुद्री तटरेखा है। ऐसे में भविष्य में मुंबई, चेन्नई या विशाखापट्टनम के समुद्री क्षेत्रों में अंडरवॉटर डेटा सेंटर विकसित करना एक व्यवहारिक विकल्प बन सकता है। इससे जमीन, बिजली और पीने के पानी की बड़ी बचत संभव होगी।
ग्रीन टेक्नोलॉजी की ओर बढ़ती दुनिया
विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती डेटा मांग और पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच अंडरवॉटर डेटा सेंटर भविष्य की जरूरत बन सकते हैं। चीन की यह पहल तकनीक और हरित ऊर्जा के मेल का नया उदाहरण मानी जा रही है, जिस पर अब दुनिया की नजरें टिकी हैं।