बरेली। उत्तर भारत के सबसे पुराने शिक्षण संस्थानों में शामिल बरेली कॉलेज आज अपने गौरवशाली सफर के 189 वर्ष पूरे कर चुका है। वर्ष 1837 में महज 57 विद्यार्थियों के साथ एक सरकारी स्कूल के रूप में शुरू हुआ यह संस्थान आज लाखों विद्यार्थियों के सपनों का केंद्र है। उपराष्ट्रपति, राज्यपाल, कुलपति, वैज्ञानिक, साहित्यकार और क्रांतिकारियों जैसी अनेक महान हस्तियों को देश को देने वाला यह संस्थान आज भी अपनी ऐतिहासिक लाल इमारत और समृद्ध विरासत के कारण अलग पहचान रखता है।

1857 की क्रांति की लपटें बरेली कॉलेज तक भी पहुंचीं। क्रांतिकारियों द्वारा तत्कालीन प्राचार्य डॉ. कारलोस बक की हत्या के बाद कॉलेज कुछ समय के लिए बंद हो गया। वर्ष 1859 में इसकी पुनर्स्थापना हुई, लेकिन 1877 में आर्थिक संकट के चलते फिर ताला लग गया। बाद में पंडित छेदालाल के प्रयासों और जयपुर के राजा जगत सिंह की अध्यक्षता में बनी समिति ने देशभर के राजाओं और रईसों से करीब 80 हजार रुपये का सहयोग जुटाया, जिसके बाद 1884 में कॉलेज का संचालन दोबारा शुरू हुआ।

रामपुर के नवाब ने दान की 110 एकड़ जमीन

वर्ष 1904-05 में अलग परिसर बनाने की शर्त के बाद रामपुर के नवाब ने कॉलेज को 110 एकड़ भूमि दान में दी। इसी परिसर में 17 जुलाई 1905 को भवन का शिलान्यास हुआ और 17 जुलाई 1906 को आज की ऐतिहासिक लाल इमारत का उद्घाटन किया गया, जो आज भी कॉलेज की पहचान बनी हुई है।

देश को दीं कई बड़ी हस्तियां

बरेली कॉलेज के छात्र रहे देश के चौथे उपराष्ट्रपति गोपाल स्वरूप पाठक, हरियाणा के पूर्व राज्यपाल सैयद मुजफ्फर हुसैन बर्नी, शहीद भगत सिंह के चाचा अजीत सिंह, भारत के पहले अंटार्कटिका अभियान के नेता डॉ. सैयद जहूर कासिम, अंतरराष्ट्रीय शायर प्रो. वसीम बरेलवी, झारखंड के राज्यपाल संतोष गंगवार समेत अनेक प्रसिद्ध व्यक्तित्वों ने इस संस्थान का नाम राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया। राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) के अध्यक्ष प्रदीप कुमार जोशी भी यहां प्रोफेसर रह चुके हैं।

क्रांति से राष्ट्र निर्माण तक निभाई भूमिका

स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान कॉलेज के विद्यार्थियों ने भारत छोड़ो आंदोलन और आजाद हिंद फौज के लिए चंदा जुटाया। कॉलेज के छात्र कृपानंदन ने आजादी से पहले ही परिसर में तिरंगा फहराकर अंग्रेजी हुकूमत को खुली चुनौती दी थी।

वर्तमान में 14 हजार छात्र, लेकिन सुविधाओं का संकट

आज बरेली कॉलेज में करीब 14 हजार विद्यार्थी, 173 स्थायी शिक्षक, 44 स्ववित्तपोषित पाठ्यक्रमों के शिक्षक और 40 अनुदेशक कार्यरत हैं। वर्ष 2013 में कॉलेज को NAAC का ‘A’ ग्रेड मिला और इसे केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने का प्रस्ताव भी भेजा गया, लेकिन यह सपना अब तक पूरा नहीं हो सका।

189 साल बाद भी इंतजार ‘अच्छे दिनों’ का

इतिहास के गौरव के बावजूद कॉलेज आज बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है। ऑडिटोरियम का अभाव, जर्जर होती ऐतिहासिक इमारत, खंडहर बनता आजाद छात्रावास, बदहाल स्विमिंग पूल, मल्टीपर्पज हॉल और उपेक्षित हॉकी मैदान जैसी समस्याएं अब भी समाधान का इंतजार कर रही हैं। शिक्षकों और विद्यार्थियों को उम्मीद है कि 189 वर्ष पूरे करने वाला यह ऐतिहासिक संस्थान जल्द ही फिर अपने स्वर्णिम दौर की ओर लौटेगा।

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