बिजनेस। भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है, लेकिन कामगारों की उत्पादकता यानी लेबर प्रोडक्टिविटी के मामले में देश अब भी चीन से काफी पीछे है। एक नई रिसर्च रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि वर्ष 2000 के बाद से भारत और चीन के बीच प्रोडक्टिविटी का अंतर और बढ़ गया है। वर्तमान में भारत का उत्पादकता स्तर लगभग बांग्लादेश के बराबर बताया गया है।
प्रति कर्मचारी 30 हजार डॉलर से ज्यादा का अंतर
इक्विरस सिक्योरिटीज की रिपोर्ट के अनुसार पिछले दो दशकों में चीन ने उत्पादकता बढ़ाने में बड़ी सफलता हासिल की है। इसके मुकाबले भारत प्रति कर्मचारी उत्पादकता के मामले में करीब 30 हजार डॉलर पीछे रह गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत अब तक वह औद्योगिक उत्पादकता उछाल हासिल नहीं कर पाया है, जो चीन, दक्षिण कोरिया और वियतनाम जैसे देशों ने अपने विकास के दौर में दर्ज किया था।
GDP बढ़ी, लेकिन उत्पादकता नहीं
रिपोर्ट के मुताबिक 1995 के बाद भारत की प्रति कर्मचारी जीडीपी तीन गुना से अधिक बढ़ी है। इसके बावजूद उत्पादकता में वृद्धि उतनी तेज नहीं रही। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल आर्थिक विकास दर बढ़ना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उत्पादन क्षमता और कार्यकुशलता बढ़ाना भी जरूरी है। महामारी के बाद के दौर में वियतनाम को सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला देश बताया गया है। इसके पीछे मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में विदेशी निवेश और औद्योगिक विस्तार को प्रमुख कारण माना गया है। वहीं भारत अब भी कई संरचनात्मक चुनौतियों से जूझ रहा है।
नोटबंदी, GST और कोरोना का असर
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की उत्पादकता पर नोटबंदी, जीएसटी लागू होने के शुरुआती प्रभाव और एनबीएफसी संकट का असर पड़ा। वहीं कोरोना महामारी के दौरान भारत को सबसे बड़ा झटका लगा, क्योंकि देश की बड़ी आबादी अनौपचारिक क्षेत्र पर निर्भर है। विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में आईटी और सेवा क्षेत्र ने बेहतर प्रदर्शन किया है, लेकिन मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर अपेक्षित गति नहीं पकड़ पाया। इसी वजह से कुल उत्पादकता वृद्धि सीमित रही है। यदि सेवा क्षेत्र को अलग कर दिया जाए तो उत्पादन आधारित क्षेत्रों में वृद्धि काफी कमजोर दिखाई देती है।
PLI और China+1 से मिल रही रफ्तार
रिपोर्ट के अनुसार केंद्र सरकार की प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI) योजना और ‘चाइना+1’ रणनीति से इलेक्ट्रॉनिक्स, फार्मा और ऑटो कंपोनेंट सेक्टर को फायदा मिल रहा है। हालांकि इससे अभी तक अर्थव्यवस्था में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा बड़े स्तर पर नहीं बढ़ पाया है। भारत की प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारणों में ऊंची लॉजिस्टिक्स लागत भी शामिल है। जहां चीन में लॉजिस्टिक्स लागत जीडीपी का 8-9 प्रतिशत है, वहीं भारत में यह 13-14 प्रतिशत के आसपास बनी हुई है।
सुधारों की जरूरत पर जोर
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के पास युवा आबादी, मजबूत डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, विदेशी निवेश और पूंजी बाजार जैसी बड़ी ताकतें हैं। लेकिन चीन जैसी उच्च उत्पादकता हासिल करने के लिए भूमि सुधार, परिवहन लागत में कमी और श्रम बाजार सुधार जैसे बड़े संरचनात्मक बदलावों की जरूरत होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कैपेक्स और PLI योजनाएं पर्याप्त नहीं हैं। भारत को वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आगे बढ़ने के लिए उत्पादन क्षमता और कार्यकुशलता बढ़ाने वाले व्यापक सुधारों पर तेजी से काम करना होगा।