Health Desk: दिनभर में बार-बार पेशाब आना कई लोग सामान्य समस्या समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन यह कई गंभीर बीमारियों का शुरुआती संकेत भी हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे में सामान्य से अधिक बार पेशाब जाना पड़ रहा है या रात में बार-बार नींद टूट रही है, तो इसे हल्के में नहीं लेना चाहिए।
आमतौर पर एक स्वस्थ व्यक्ति दिनभर में छह से आठ बार पेशाब करता है। इससे अधिक बार पेशाब आने की समस्या को फ्रिक्वेंट यूरिनेशन कहा जाता है। यह स्थिति व्यक्ति की नींद, कामकाज और दैनिक जीवन को प्रभावित कर सकती है। लगातार ऐसा होने पर थकान, तनाव और कार्यक्षमता में कमी जैसी परेशानियां भी बढ़ सकती हैं।
इन बीमारियों का हो सकता है संकेत
- विशेषज्ञों के मुताबिक बार-बार पेशाब आना केवल अधिक पानी पीने या मौसम बदलने का परिणाम नहीं होता, बल्कि यह कई बीमारियों का लक्षण भी हो सकता है।
- यूरिनरी ट्रैक्ट इन्फेक्शन (यूटीआई) होने पर पेशाब में जलन, बार-बार पेशाब की इच्छा और पेट के निचले हिस्से में दर्द की शिकायत हो सकती है।
- पुरुषों में बढ़ी हुई प्रोस्टेट ग्रंथि (बीपीएच) भी पेशाब के रास्ते पर दबाव बनाती है, जिससे खासतौर पर रात में बार-बार पेशाब जाना पड़ता है।
- डायबिटीज के मरीजों में हाई ब्लड शुगर के कारण किडनी को अधिक मेहनत करनी पड़ती है, जिससे पेशाब की मात्रा बढ़ जाती है।
- इसके अलावा ओवरएक्टिव ब्लैडर, किडनी रोग और कुछ न्यूरोलॉजिकल बीमारियां भी बार-बार पेशाब आने की वजह बन सकती हैं।
इन लक्षणों पर तुरंत कराएं जांच
यदि बार-बार पेशाब आने के साथ पेशाब में जलन, दर्द, खून आना, पेशाब रोकने में कठिनाई, अत्यधिक प्यास लगना, पेट या पेल्विक क्षेत्र में दर्द, पेशाब शुरू करने में दिक्कत या रात में कई बार उठना जैसी समस्याएं हों तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए।
कैसे पा सकते हैं राहत
विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि कैफीन, चाय, कॉफी और शराब का सेवन कम करें। सोने से पहले अधिक मात्रा में तरल पदार्थ पीने से बचें। यदि डायबिटीज है तो ब्लड शुगर को नियंत्रित रखें और यूटीआई जैसी समस्या होने पर समय पर इलाज कराएं।
बीमारी नहीं, लेकिन बीमारी का संकेत जरूर
डॉक्टरों का कहना है कि बार-बार पेशाब आना अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, लेकिन यह शरीर में छिपी कई गंभीर समस्याओं का संकेत हो सकता है। इसलिए यदि यह समस्या लगातार बनी रहे तो समय रहते जांच कराना जरूरी है, ताकि बीमारी की पहचान शुरुआती चरण में हो सके और गंभीर जटिलताओं से बचा जा सके।