नई दिल्ली। भारत में इथेनॉल मिश्रित ईंधन को बढ़ावा देने के बीच अब तीसरी पीढ़ी यानी 3G इथेनॉल तकनीक चर्चा में है। विशेषज्ञों के अनुसार यह तकनीक पारंपरिक इथेनॉल उत्पादन से कई कदम आगे मानी जा रही है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें गन्ना, मक्का या अन्य खाद्य फसलों की जगह समुद्री शैवाल (काई), जलीय पौधों और औद्योगिक कचरे का उपयोग किया जाता है। इससे खाद्यान्न संकट की आशंकाएं कम होने के साथ-साथ पर्यावरण संरक्षण को भी नई मजबूती मिल सकती है।

क्या है 3G इथेनॉल?

3G इथेनॉल इथेनॉल उत्पादन की सबसे आधुनिक तकनीक मानी जाती है। इसमें ऐसे जैविक स्रोतों का उपयोग किया जाता है जिनका खाद्य श्रृंखला से कोई सीधा संबंध नहीं होता। समुद्री शैवाल और औद्योगिक अपशिष्ट से तैयार होने वाला यह ईंधन कार्बन उत्सर्जन कम करने में भी मददगार माना जा रहा है।

1G और 2G इथेनॉल से कैसे अलग?

पहली पीढ़ी (1G) का इथेनॉल गन्ने, मक्का और टूटे चावल जैसी खाद्य सामग्री से बनाया जाता है। दूसरी पीढ़ी (2G) में पराली, भूसा और कृषि अवशेषों का उपयोग होता है। जबकि 3G इथेनॉल के लिए समुद्री शैवाल, जलीय पौधों और औद्योगिक कचरे का इस्तेमाल किया जाता है। यही वजह है कि इसे अधिक टिकाऊ और पर्यावरण अनुकूल तकनीक माना जा रहा है।

कैसे तैयार होता है 3G इथेनॉल?

इस प्रक्रिया में सबसे पहले विशेष प्रकार के शैवाल को बड़े टैंकों, फोटो-बायोरिएक्टरों या समुद्री क्षेत्रों में उगाया जाता है। इसके बाद शैवाल को सुखाकर उसका बायोमास तैयार किया जाता है। रासायनिक और यांत्रिक प्रक्रियाओं के जरिए उसमें मौजूद स्टार्च और कार्बोहाइड्रेट निकाले जाते हैं। फिर यीस्ट और बैक्टीरिया की मदद से उनका फर्मेंटेशन किया जाता है, जिससे अल्कोहल बनता है। अंत में शुद्धिकरण प्रक्रिया के बाद 3G इथेनॉल तैयार हो जाता है।

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कई क्षेत्रों में होगा इस्तेमाल

विशेषज्ञों का मानना है कि 3G इथेनॉल का उपयोग पेट्रोल में ब्लेंडिंग के अलावा विमानन ईंधन, बायोप्लास्टिक, औद्योगिक रसायन और बिजली उत्पादन में भी किया जा सकेगा। इससे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता घटाने में मदद मिल सकती है।

भारत के लिए क्यों अहम?

ऊर्जा सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण और कचरा प्रबंधन जैसी चुनौतियों से जूझ रहे भारत के लिए 3G इथेनॉल एक बड़ा विकल्प बनकर उभर सकता है। यदि इस तकनीक का बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उपयोग शुरू होता है तो यह देश को हरित ऊर्जा की दिशा में नई गति दे सकता है। साथ ही पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम होने से विदेशी मुद्रा की भी बचत होगी।

फैक्ट फाइल

  • 1G इथेनॉल: गन्ना, मक्का, चावल से तैयार
  • 2G इथेनॉल: पराली और कृषि कचरे से तैयार
  • 3G इथेनॉल: शैवाल, जलीय पौधे और इंडस्ट्रियल वेस्ट से तैयार
  • प्रमुख लाभ: कम प्रदूषण, खाद्यान्न पर दबाव नहीं, अधिक टिकाऊ ईंधन
  • संभावित उपयोग: वाहन, विमान, उद्योग और बिजली उत्पादन में

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