म्यांमार में जारी गृहयुद्ध अब सिर्फ सत्ता संघर्ष तक सीमित नहीं रह गया है। चीन ने इस अस्थिरता के बीच म्यांमार के दुर्लभ खनिज संसाधनों पर अपनी पकड़ मजबूत करनी शुरू कर दी है। विशेषज्ञों का मानना है कि चीन सीमावर्ती विद्रोही गुटों के जरिए न केवल आर्थिक फायदा उठा रहा है, बल्कि भारत की पूर्वोत्तर सीमा पर रणनीतिक दबाव भी बढ़ा रहा है।
रेयर अर्थ खनिजों पर चीन का बढ़ता नियंत्रण
म्यांमार का कचीन प्रांत दुर्लभ खनिजों का बड़ा केंद्र माना जाता है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2017 से 2024 के बीच चीन ने म्यांमार से लाखों टन रेयर अर्थ खनिज आयात किए। इन खनिजों का इस्तेमाल इलेक्ट्रिक वाहन, मोबाइल, मिसाइल सिस्टम और हाईटेक उपकरणों में होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि चीन ने म्यांमार के सीमावर्ती इलाकों में आर्थिक निर्भरता का ऐसा नेटवर्क तैयार किया है, जिससे स्थानीय सशस्त्र गुट उस पर निर्भर होते जा रहे हैं।
भारत की सीमा पर बढ़ी सुरक्षा चुनौती
भारत और म्यांमार के बीच करीब 1,643 किलोमीटर लंबी सीमा है, जो मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश से जुड़ी है। म्यांमार में अस्थिरता बढ़ने के बाद इन इलाकों में विद्रोही गतिविधियों और हथियारों की तस्करी को लेकर चिंता बढ़ गई है। सुरक्षा एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि सीमावर्ती इलाकों में कई गुट अब अपने अलग लॉजिस्टिक नेटवर्क और सप्लाई चैन बना चुके हैं।
भारत की परियोजनाओं पर भी असर
म्यांमार में अस्थिरता का असर भारत की कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं पर भी पड़ा है। भारत-म्यांमार-थाईलैंड त्रिपक्षीय हाईवे और कलादान मल्टी-मोडल ट्रांजिट प्रोजेक्ट जैसी योजनाएं लंबे समय से धीमी गति का सामना कर रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को अब सिर्फ म्यांमार की केंद्रीय सरकार ही नहीं, बल्कि सीमावर्ती क्षेत्रों की जमीनी परिस्थितियों को ध्यान में रखकर नई रणनीति तैयार करनी होगी।
एक्ट ईस्ट पॉलिसी के सामने नई चुनौती
म्यांमार में बदलते हालात ने भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी के सामने नई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। रणनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि चीन धीरे-धीरे आर्थिक प्रभाव को भू-राजनीतिक ताकत में बदल रहा है, जबकि भारत को अब तेज और व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है।