नई दिल्ली/इस्लामाबाद। भारत और पाकिस्तान के बीच बहुचर्चित सिंधु जल संधि अब नए दौर के सबसे बड़े जल-संकट की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। बीते एक साल से चल रहे तनाव, संधि के निलंबन और बदलते जलवायु हालातों ने इस मुद्दे को और अधिक संवेदनशील बना दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि गर्मियों के दौरान भारत द्वारा डाउनस्ट्रीम जल प्रवाह में कमी आती है, तो पाकिस्तान के लिए हालात बेहद गंभीर हो सकते हैं। खेती, पेयजल और बिजली उत्पादन पर इसका सीधा असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
पहलगाम हमले के बाद बदली तस्वीर, भारत ने लिया सख्त रुख
अप्रैल 2025 में जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों में सख्ती दिखाई थी। इसी क्रम में भारत ने 1960 की सिंधु जल संधि को निलंबित करने का बड़ा फैसला लिया। यह कदम सिर्फ कूटनीतिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी माना जा रहा है। सिंधु नदी प्रणाली, जिसमें इंडस, झेलम और चिनाब जैसी प्रमुख नदियां शामिल हैं, दोनों देशों के करीब 30 करोड़ लोगों की जीवनरेखा है। खासतौर पर पाकिस्तान की कृषि व्यवस्था इस जल पर पूरी तरह निर्भर है। ऐसे में पानी का प्रवाह कम होना वहां के लिए आर्थिक और सामाजिक संकट खड़ा कर सकता है।
गर्मियों में बढ़ेगा संकट, पानी रुका तो खेत हो जाएंगे सूखे
विशेषज्ञों का कहना है कि गर्मी के महीनों में सिंधु नदी का जल प्रवाह सबसे अहम होता है क्योंकि इसी समय फसलों की सिंचाई की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। यदि भारत इस दौरान पानी के बहाव को नियंत्रित करता है या कम करता है, तो पाकिस्तान के पंजाब और सिंध प्रांत में खेती पर सीधा असर पड़ेगा। जल विशेषज्ञों के अनुसार, पाकिस्तान पहले ही जल संकट से जूझ रहा है। भूजल स्तर गिर रहा है और वर्षा का पैटर्न भी अस्थिर हो चुका है। ऐसे में सिंधु का पानी कम होना “डबल शॉक” साबित हो सकता है।
जलवायु परिवर्तन ने बिगाड़ी पूरी गणित, ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे
चाथम हाउस से जुड़े पर्यावरण विशेषज्ञों भार्गवी भारद्वाज और डॉ. बीट्रिस मोसेलो ने अपने विश्लेषण में बताया है कि सिंधु बेसिन में जलवायु परिवर्तन का असर तेजी से बढ़ रहा है। 2001 से 2021 के बीच इस क्षेत्र में ग्लेशियरों और स्थायी बर्फ का दायरा करीब 24.8% तक घट चुका है। ग्लेशियरों के पिघलने से शुरुआती समय में पानी की मात्रा बढ़ती है, लेकिन लंबे समय में यह जल स्रोत कमजोर पड़ जाते हैं। इसका मतलब है कि आने वाले वर्षों में सिंधु नदी में पानी की उपलब्धता और भी अनिश्चित हो सकती है।
भरोसा टूटा तो बढ़ा विवाद, संधि की व्याख्या पर टकराव
सिंधु जल संधि दशकों तक भारत और पाकिस्तान के बीच एक मजबूत समझ का प्रतीक रही है। लेकिन हाल के वर्षों में दोनों देशों के बीच भरोसे में आई कमी ने इस संधि को भी प्रभावित किया है। अब दोनों देश संधि की अलग-अलग व्याख्या कर रहे हैं, जिससे विवाद बढ़ रहा है। पहले जहां विवादों को तकनीकी स्तर पर सुलझा लिया जाता था, अब वह राजनीतिक और कूटनीतिक मुद्दा बन चुका है। इससे समाधान की राह और मुश्किल हो गई है।
बैकडोर डिप्लोमेसी ही विकल्प? एक्सपर्ट्स ने दी सलाह
विशेषज्ञों का मानना है कि मौजूदा हालात में बैकडोर बातचीत ही इस संकट का समाधान निकाल सकती है। पानी जैसे संवेदनशील मुद्दे पर खुला टकराव दोनों देशों के लिए नुकसानदायक हो सकता है। भार्गवी भारद्वाज और डॉ. मोसेलो का कहना है कि “चुनौतीपूर्ण भू-राजनीतिक हालातों के बावजूद जल सहयोग को बनाए रखना जरूरी है। यह न सिर्फ तनाव को कम करेगा बल्कि दीर्घकालिक शांति के लिए भी जरूरी है।”
अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी अहम
इस पूरे विवाद में अंतरराष्ट्रीय समुदाय की भूमिका भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। सिंधु जल संधि विश्व बैंक की मध्यस्थता में बनी थी और इसे दुनिया के सबसे सफल जल समझौतों में गिना जाता है। अब जब जलवायु परिवर्तन और भू-राजनीतिक तनाव एक साथ इस संधि को प्रभावित कर रहे हैं, तो वैश्विक संस्थाओं को भी सक्रिय भूमिका निभानी होगी। विशेषज्ञों का मानना है कि एक नया फ्रेमवर्क तैयार करने की जरूरत है, जो बदलते पर्यावरणीय हालातों के अनुकूल हो।