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लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति को झकझोर देने वाले आंकड़े सामने आए हैं। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के बाद प्रदेश की वोटर लिस्ट में ऐसा बदलाव हुआ है, जिसने एक दशक पुरानी तस्वीर को भी पीछे छोड़ दिया है। ताजा आंकड़ों के मुताबिक प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या 2014 के लोकसभा चुनाव से भी कम हो गई है। करीब 13 प्रतिशत नाम वोटर लिस्ट से बाहर हो गए हैं, जो अब तक का सबसे बड़ा ‘सफाई अभियान’ माना जा रहा है।

13% वोटर गायब, आंकड़ा 15.44 करोड़ से गिरकर 13.40 करोड़

SIR से पहले उत्तर प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 15.44 करोड़ थी। संशोधन के बाद यह घटकर करीब 13.40 करोड़ (133984792) रह गई है। यानी करीब 2 करोड़ से ज्यादा वोटर सूची से बाहर हो गए। अगर तुलना 2014 के लोकसभा चुनाव से करें, तो उस समय प्रदेश में 13.89 करोड़ वोटर थे। मौजूदा आंकड़ा उससे भी करीब 49 लाख कम है। इससे साफ है कि प्रदेश की वोटर लिस्ट अब एक दशक पीछे चली गई है।

हर विधानसभा में औसतन 71 हजार वोट कटे

आंकड़ों का विश्लेषण बताता है कि SIR के बाद प्रदेश की हर विधानसभा सीट पर औसतन 71,647 वोट कम हुए हैं। यह गिरावट चुनावी समीकरणों को सीधे प्रभावित कर सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इतने बड़े पैमाने पर वोटरों का हटना न केवल चुनावी गणित बदलेगा, बल्कि कई सीटों पर जीत-हार का अंतर भी तय कर सकता है।

महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर, 1.12 करोड़ नाम हटे

इस पूरे संशोधन में सबसे ज्यादा असर महिला वोटरों पर पड़ा है। पहले जहां महिला मतदाताओं की संख्या 7.11 करोड़ थी, वहीं अब यह घटकर 6.09 करोड़ रह गई है। यानी करीब 1.12 करोड़ महिलाओं के नाम सूची से हट गए। यह गिरावट सिर्फ वर्तमान सूची तक सीमित नहीं है, बल्कि 2014 के मुकाबले भी महिला वोटरों की संख्या करीब 20 लाख कम हो गई है। ऐसे में ‘नारी वंदन’ जैसे राजनीतिक नारों के बीच यह आंकड़ा सियासी हलकों में चर्चा का विषय बन गया है।

पुरुष वोटरों में भी गिरावट, लेकिन असर कम

महिलाओं के मुकाबले पुरुष वोटरों पर इसका असर अपेक्षाकृत कम रहा है। आंकड़ों के मुताबिक करीब 43 लाख पुरुष वोटर सूची से हटे हैं। हालांकि यह संख्या भी कम नहीं है, लेकिन महिला वोटरों के मुकाबले यह गिरावट काफी कम है, जिससे जेंडर बैलेंस पर असर पड़ सकता है।

2003 के बाद सबसे बड़ा संशोधन अभियान

उत्तर प्रदेश में इससे पहले वर्ष 2003 में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन हुआ था। उस समय की वोटर लिस्ट को आधार बनाकर इस बार की सूची को अपडेट किया गया। 2002 के विधानसभा चुनाव में प्रदेश में 9.35 करोड़ मतदाता थे, जो 2004 के लोकसभा चुनाव तक बढ़कर 11.06 करोड़ हो गए थे। लेकिन इस बार की प्रक्रिया में आंकड़े उलट गए और संख्या घटकर नीचे आ गई।

क्या है इतनी बड़ी कटौती की वजह?

जानकारों का कहना है कि इस बार SIR के दौरान डुप्लीकेट, मृत और स्थानांतरित मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए। इसके अलावा दस्तावेजों की कमी और सत्यापन में असफल रहने वाले नाम भी सूची से बाहर कर दिए गए। हालांकि सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या इतने बड़े पैमाने पर नाम हटना पूरी तरह तकनीकी प्रक्रिया का नतीजा है या इसमें कहीं न कहीं लापरवाही भी शामिल है।

सियासी रणनीति पर पड़ेगा असर

वोटर लिस्ट में इस बड़े बदलाव का सीधा असर राजनीतिक दलों की रणनीति पर पड़ेगा। खासतौर पर महिला वोटरों की संख्या में आई गिरावट कई सीटों पर समीकरण बदल सकती है। पिछले कुछ चुनावों में महिलाओं की भागीदारी लगातार बढ़ी थी और कई सीटों पर उनका वोट प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा रहा। ऐसे में यह बदलाव राजनीतिक दलों के लिए नई चुनौती खड़ी कर सकता है।

विपक्ष ने उठाए सवाल, पारदर्शिता की मांग

इस मुद्दे पर विपक्षी दलों ने भी सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। उनका कहना है कि इतने बड़े पैमाने पर वोटरों का नाम हटना चिंताजनक है और इसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। वहीं, चुनाव आयोग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी तरीके से की गई है और इसका उद्देश्य सिर्फ सूची को शुद्ध करना था।

मतदाताओं के लिए चेतावनी: नाम जरूर जांचें

इस पूरे घटनाक्रम के बीच सबसे अहम बात यह है कि आम मतदाता अपने नाम की स्थिति जरूर जांच लें। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर किसी का नाम गलती से हट गया है तो उसे समय रहते ठीक कराया जा सकता है। चुनाव से पहले वोटर लिस्ट में नाम होना लोकतंत्र की सबसे बुनियादी शर्त है, इसलिए किसी भी तरह की लापरवाही भारी पड़ सकती है।

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