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नई दिल्ली। देश में लगातार बढ़ती गर्मी अब सिर्फ मौसम का मसला नहीं रह गई है, बल्कि यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए भी एक बड़ी चुनौती बनती जा रही है। भीषण हीटवेव के बीच चुनाव कराना प्रशासन, चुनाव आयोग और सरकार के लिए अग्निपरीक्षा से कम नहीं है। जहां एक ओर मतदाताओं की भागीदारी सुनिश्चित करना जरूरी है, वहीं दूसरी ओर उनकी सुरक्षा और स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही अहम हो गया है।

बढ़ती हीटवेव: आंकड़े दे रहे खतरे की चेतावनी

भारत में हर साल हीटवेव का असर तेज होता जा रहा है। विशेषज्ञों के मुताबिक, आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है। विश्व बैंक की रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2030 तक भारत में करीब 20 करोड़ लोग अत्यधिक गर्मी से प्रभावित होंगे। इससे न केवल लोगों की कार्यक्षमता घटेगी बल्कि करीब 3 करोड़ नौकरियों पर भी संकट मंडरा सकता है। गर्मी का सीधा असर चुनावों पर भी पड़ता है। तापमान 45 डिग्री के पार पहुंचते ही लोगों का घर से निकलना मुश्किल हो जाता है। ऐसे में मतदान प्रतिशत गिरने का खतरा बढ़ जाता है, जिससे लोकतंत्र की भागीदारी प्रभावित होती है।

चुनावी तैयारी पर गर्मी का असर

देश के कई राज्यों में चुनावी प्रक्रिया जारी है। असम, पुद्दुचेरी और केरल में मतदान हो चुका है, जबकि पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में मतदान होना बाकी है। इन राज्यों में तापमान लगातार बढ़ रहा है, जिससे चुनाव आयोग की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। खुले में लगने वाले मतदान केंद्र, लंबी कतारें और घंटों इंतजार—ये सभी स्थितियां हीटवेव के दौरान खतरनाक साबित हो सकती हैं। विशेष रूप से बुजुर्ग, महिलाएं, बच्चे और दिव्यांग मतदाता ज्यादा जोखिम में रहते हैं।

नवी मुंबई की घटना से सबक

वर्ष 2023 में नवी मुंबई में आयोजित एक बड़े सार्वजनिक कार्यक्रम में हजारों लोग तेज धूप में घंटों तक बैठे रहे। इस दौरान कई लोगों की तबीयत बिगड़ी और कुछ की मौत भी हो गई। यह घटना बताती है कि भीड़ और गर्मी का संयोजन कितना खतरनाक हो सकता है। चुनावी रैलियों और सभाओं में भी इसी तरह की भीड़ उमड़ती है। अगर पर्याप्त इंतजाम न हों तो ऐसी घटनाएं दोबारा हो सकती हैं।

चुनाव आयोग और एजेंसियों की तैयारी

हीटवेव के खतरे को देखते हुए चुनाव आयोग ने विशेष दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मौसम विभाग की चेतावनियों के आधार पर मतदान केंद्रों पर अतिरिक्त सुविधाएं उपलब्ध कराने के निर्देश दिए गए हैं।

राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) ने भी ‘क्या करें और क्या न करें’ की सूची जारी की है, जिसमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • मतदान केंद्रों पर छाया और पानी की व्यवस्था
  • प्राथमिक चिकित्सा केंद्र की उपलब्धता
  • गर्मी के पीक समय में मतदान से बचाव के उपाय
  • कर्मचारियों के लिए शिफ्ट आधारित ड्यूटी

इन कदमों का उद्देश्य मतदाताओं और चुनाव कर्मचारियों दोनों की सुरक्षा सुनिश्चित करना है।

जागरूकता और भागीदारी की अहम भूमिका

हीटवेव से निपटने के लिए सिर्फ सरकारी प्रयास ही काफी नहीं हैं। आम नागरिकों की जागरूकता भी उतनी ही जरूरी है। चुनाव के दौरान बड़ी संख्या में लोग बाहर निकलते हैं, ऐसे में सही जानकारी और सावधानी बेहद जरूरी है।

मतदाताओं को सलाह दी जा रही है कि:

  • मतदान के समय पानी साथ रखें
  • छाता या टोपी का इस्तेमाल करें
  • हल्के और ढीले कपड़े पहनें
  • दोपहर की तेज धूप से बचें

जागरूकता से ही बड़ी घटनाओं को रोका जा सकता है और मतदान प्रक्रिया को सुरक्षित बनाया जा सकता है।

NGO और समाज की जिम्मेदारी

गैर सरकारी संगठनों (NGO) की भूमिका भी इस दौरान बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। खासकर बुजुर्गों, बच्चों, गर्भवती महिलाओं और मजदूरों को गर्मी से बचाव के बारे में जागरूक करना जरूरी है।

NGO द्वारा किए जा सकने वाले कार्य:

  • पानी और ORS का वितरण
  • स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन
  • हीट स्ट्रोक के लक्षणों की जानकारी देना
  • जरूरतमंदों को प्राथमिक उपचार उपलब्ध कराना

इस तरह के प्रयास चुनावी माहौल को सुरक्षित और मानवीय बना सकते हैं।

जलवायु परिवर्तन का बढ़ता असर

विशेषज्ञ मानते हैं कि हीटवेव की बढ़ती घटनाएं जलवायु परिवर्तन का सीधा परिणाम हैं। हर साल तापमान के नए रिकॉर्ड टूट रहे हैं, जिससे भविष्य में चुनाव जैसी बड़ी प्रक्रियाओं को संचालित करना और कठिन हो सकता है। अगर समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में चुनावी कैलेंडर और प्रक्रियाओं में बड़े बदलाव करने पड़ सकते हैं।

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