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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट में लिव-इन रिलेशनशिप और शादी के वादे पर शारीरिक शोषण के आरोपों से जुड़े एक मामले में अहम बहस छिड़ गई है। सुनवाई के दौरान जस्टिस बीवी नागरत्ना ने तीखे सवाल उठाते हुए कहा—“जब दोनों साथ रह रहे थे और बच्चा भी है, तो फिर अपराध का सवाल कहां से आता है?”

शादी से पहले उसके साथ रहने क्यों चली गई?

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने पूछा कि जब रिश्ता सहमति से था तो बाद में इसे अपराध कैसे कहा जा सकता है। उन्होंने टिप्पणी की—“जब हम ऐसे सवाल पूछते हैं तो कहा जाता है कि पीड़ित को शर्मिंदा किया जा रहा है… लेकिन सवाल तो उठेंगे।” मामले में आरोप है कि आरोपी ने शादी का झांसा देकर संबंध बनाए। महिला ने दावा किया कि वह 18 साल की उम्र में विधवा हो गई थी और उसकी कमजोर स्थिति का फायदा उठाया गया। हालांकि कोर्ट ने इस तथ्य पर भी गौर किया कि दोनों करीब 15 साल तक साथ रहे और उनका एक बच्चा भी है।

लिव-इन रिलेशनशिप में यही सबसे बड़ा जोखिम

जस्टिस नागरत्ना ने साफ कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप में कानूनी बंधन नहीं होता, इसलिए अलग होने पर हर मामला आपराधिक नहीं बन सकता। उन्होंने कहा—“अगर शादी होती तो अधिकार मजबूत होते… लेकिन बिना शादी के रिश्तों में अनिश्चितता रहती है, यही इसका जोखिम है।” कोर्ट ने महिला को सुझाव दिया कि वह बच्चे के लिए मेंटेनेंस की मांग कर सकती है। साथ ही दोनों पक्षों को आपसी समझौते पर विचार करने को भी कहा गया। जस्टिस नागरत्ना ने कहा—“आरोपी को जेल भेजने से क्या फायदा? बच्चे के भविष्य के लिए आर्थिक मदद ज्यादा जरूरी है।”

हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती

यह मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस फैसले से जुड़ा है, जिसमें आरोपी के खिलाफ दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था। अब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 25 मई तय की है। इस टिप्पणी ने एक बार फिर लिव-इन रिलेशनशिप, सहमति और कानून के दायरे को लेकर नई बहस छेड़ दी है। अदालत के सवालों ने यह साफ किया कि ऐसे मामलों में सहमति, समय अवधि और परिस्थितियों की भूमिका बेहद अहम होती है।

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