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नई दिल्ली। संसद के विशेष सत्र में गुरुवार को गहरा शोक देखने को मिला, जब राज्यसभा ने देश की दो महान हस्तियों—वरिष्ठ राजनेता Mohsina Kidwai और महान पार्श्व गायिका Asha Bhosle—को श्रद्धांजलि अर्पित की। सदन की कार्यवाही शुरू होते ही सभापति C. P. Radhakrishnan ने दोनों के निधन का जिक्र करते हुए उनके योगदान को याद किया। इसके बाद सदन में मौन रखकर उन्हें श्रद्धांजलि दी गई।

मोहसिना किदवई: छह दशक की सियासी विरासत

सभापति ने अपने संबोधन में मोहसिना किदवई के लंबे और प्रभावशाली राजनीतिक जीवन को विस्तार से याद किया। 1 जनवरी 1932 को उत्तर प्रदेश के बांदा जिले में जन्मीं किदवई ने बेहद कम उम्र में ही राजनीति में कदम रख दिया था। उन्होंने छह दशक से अधिक लंबे अपने राजनीतिक सफर में कई अहम जिम्मेदारियां निभाईं। उत्तर प्रदेश विधानसभा, विधान परिषद और संसद के दोनों सदनों की सदस्य बनने का गौरव उन्हें हासिल हुआ। राज्यसभा में उन्होंने 2004 से 2010 और फिर 2010 से 2016 तक छत्तीसगढ़ का प्रतिनिधित्व किया। इसके अलावा, वह उत्तर प्रदेश सरकार और केंद्र सरकार में मंत्री भी रहीं। सभापति ने कहा कि किदवई का पूरा जीवन समाज के कमजोर और वंचित वर्गों के कल्याण के लिए समर्पित रहा। उनका योगदान भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा।

राजनीति से परे मानवीय संवेदनाओं की मिसाल

मोहसिना किदवई सिर्फ एक नेता नहीं थीं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़ी एक संवेदनशील शख्सियत भी थीं। उन्होंने महिलाओं, अल्पसंख्यकों और गरीब तबकों के उत्थान के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उनके निधन को देश की राजनीति के लिए एक बड़ी क्षति बताते हुए सभापति ने कहा कि उनकी सादगी, समर्पण और कार्यशैली आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनी रहेगी।

आशा भोसले: संगीत की अमर आवाज को नमन

इसके बाद सभापति ने भारतीय संगीत जगत की महान हस्ती आशा भोसले को याद करते हुए कहा कि उन्होंने अपने अद्वितीय स्वर से भारतीय सिनेमा और संगीत को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में जन्मीं आशा भोसले ने अपने करियर में हजारों गीत गाए, जो आज भी लोगों के दिलों में बसे हुए हैं। उनकी आवाज में वह जादू था, जिसने हर पीढ़ी को मंत्रमुग्ध किया। चाहे ग़ज़ल हो, फिल्मी गीत या लोक संगीत—हर शैली में उन्होंने अपनी अलग पहचान बनाई।

आठ दशक का सफर, हजारों गीतों की विरासत

सभापति ने कहा कि आठ दशक से अधिक लंबे अपने करियर में आशा भोसले ने कई भारतीय भाषाओं में गीत गाकर एक अमिट छाप छोड़ी। उनके योगदान को देखते हुए उन्हें पद्म विभूषण, दादासाहेब फाल्के पुरस्कार और कई राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। इसके अलावा उन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी कई प्रतिष्ठित सम्मान मिले। उन्होंने भारतीय संगीत को वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने में अहम भूमिका निभाई।

देश ने खोई एक सांस्कृतिक धरोहर

सभापति ने कहा कि आशा भोसले का निधन सिर्फ एक कलाकार की विदाई नहीं है, बल्कि एक युग का अंत है। उन्होंने कहा, “देश ने एक ऐसी आवाज खो दी है, जिसने पीढ़ियों को जोड़ने का काम किया। उनकी विरासत हमेशा जीवित रहेगी और आने वाली पीढ़ियों को प्रेरित करती रहेगी।”

सदन में छाया सन्नाटा, रखा गया मौन

दोनों महान हस्तियों को श्रद्धांजलि देते हुए राज्यसभा के सभी सदस्यों ने कुछ पल मौन रखा। इस दौरान सदन में गहरा सन्नाटा छा गया और हर सदस्य भावुक नजर आया। यह क्षण भारतीय लोकतंत्र और संस्कृति के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का प्रतीक बन गया।

दो अलग क्षेत्रों की महान हस्तियां, एक जैसा सम्मान

एक ओर जहां मोहसिना किदवई ने राजनीति के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ी, वहीं आशा भोसले ने संगीत की दुनिया में अपनी आवाज से इतिहास रचा। दोनों ने अपने-अपने क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल की और देश का नाम रोशन किया। राज्यसभा में उन्हें दी गई श्रद्धांजलि इस बात का प्रमाण है कि देश अपने महान व्यक्तित्वों को कभी नहीं भूलता।

विरासत जो हमेशा जिंदा रहेगी

मोहसिना किदवई की राजनीतिक सोच और सामाजिक सेवा, तथा आशा भोसले की मधुर आवाज—दोनों ही भारतीय समाज की अमूल्य धरोहर हैं। उनका जीवन और कार्य आने वाली पीढ़ियों को प्रेरणा देता रहेगा। संसद में दी गई श्रद्धांजलि ने एक बार फिर यह साबित किया कि महान लोग भले ही इस दुनिया से चले जाएं, लेकिन उनकी विरासत हमेशा जीवित रहती है।

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