नई दिल्ली। भारत और ब्रिटेन में शरिया कानून को लेकर ब्रिटिश पत्रिका The Economist के अलग-अलग लेखों पर सोशल मीडिया में बहस छिड़ गई है। हिंदू अमेरिकन फाउंडेशन की एग्जीक्यूटिव डायरेक्टर सुहाग ए. शुक्ला ने 2016 और 2026 के दो लेखों का हवाला देते हुए पत्रिका के रुख पर सवाल उठाया। उनकी पोस्ट पर प्रतिक्रिया देते हुए भारतीय सेना के रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने भी इसे पश्चिमी संस्थाओं के कथित दोहरे मापदंड से जोड़ते हुए तीखी टिप्पणी की।

2016 और 2026 के लेखों को लेकर छिड़ी बहस

विवाद की शुरुआत सुहाग ए. शुक्ला की सोशल मीडिया पोस्ट से हुई। उन्होंने The Economist के दो अलग-अलग समय के लेख साझा करते हुए दावा किया कि भारत के संदर्भ में पत्रिका ने यूनिफॉर्म सिविल कोड के साथ शरिया कानून के लिए भी जगह बनाए रखने का समर्थन किया था, जबकि ब्रिटेन के संदर्भ में शरिया व्यवस्था से पैदा होने वाली समस्याओं को लेकर सवाल उठाए गए। शुक्ला ने दोनों लेखों की तुलना करते हुए सवाल किया कि क्या एक ही मुद्दे पर भारत और ब्रिटेन के लिए अलग-अलग मानदंड अपनाए जा रहे हैं।

डीपी पांडेय बोले—अपने लिए खराब, भारत के लिए अच्छा?

सुहाग शुक्ला की पोस्ट पर रिटायर्ड लेफ्टिनेंट जनरल डीपी पांडेय ने प्रतिक्रिया देते हुए The Economist के कथित विरोधाभासी रुख की आलोचना की। उन्होंने कहा कि जो व्यवस्था अपने देश के लिए ठीक नहीं मानी जाती, उसे भारत के लिए उचित बताने का नजरिया सवाल खड़े करता है। उन्होंने इस मुद्दे को केवल शरिया कानून तक सीमित नहीं रखा, बल्कि मानवाधिकार, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, पारंपरिक मीडिया, व्यापारिक बाधाओं और किसानों को दिए जाने वाले प्रोत्साहन जैसे विषयों का भी उल्लेख किया।

पश्चिमी संस्थाओं पर लगाए दोहरे मापदंड के आरोप

पूर्व सैन्य अधिकारी ने अपनी पोस्ट में पश्चिमी देशों के प्रभाव वाली संस्थाओं और सरकारों पर अलग-अलग देशों के लिए अलग मानदंड अपनाने का आरोप लगाया। उन्होंने मीडिया, तकनीक और आर्थिक प्रभाव का जिक्र करते हुए कहा कि दुनिया का व्यवहार उपनिवेशों और पूर्व गुलाम देशों के प्रति हमेशा निष्पक्ष नहीं रहा है।

सोशल मीडिया पर UCC और शरिया को लेकर फिर चर्चा

इस पोस्ट के बाद यूनिफॉर्म सिविल कोड और शरिया कानून को लेकर सोशल मीडिया पर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई। हालांकि पूरा विवाद मुख्य रूप से The Economist के अलग-अलग समय पर प्रकाशित लेखों की व्याख्या और उन पर सुहाग शुक्ला तथा डीपी पांडेय की प्रतिक्रियाओं पर आधारित है। ऐसे में पत्रिका के मूल लेखों के संदर्भ और तर्कों को भी उसके संबंधित प्रकाशनों के पूरे संदर्भ में देखा जाना जरूरी है।

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