जुलाई के तीसरे सप्ताह में नई दिल्ली में युवाओं का विरोध प्रदर्शन संसद मार्च तक पहुंचा और प्रदर्शनकारियों के वीडियो =-0987][po8/शल मीडिया पर तेजी से वायरल हुए तो इसकी गूंज नेपाल तक सुनाई दी। भारत में चल रहे घटनाक्रम को देख रहे कई नेपालियों के जेहन में अपने देश में सितंबर 2025 में हुए Gen Z आंदोलन की यादें ताजा हो गईं। चिंता यह थी कि भारत में युवाओं का आक्रोश कहीं नेपाल जैसी हिंसा और अराजकता की तरफ न बढ़ जाए।

नेपाल में 8 सितंबर 2025 को शुरू हुआ Gen Z आंदोलन भी शुरुआत में भ्रष्टाचार और खराब शासन व्यवस्था के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध के तौर पर देखा गया था। स्कूल, कॉलेज और विश्वविद्यालयों के युवा सड़कों पर उतरे थे। उनका आरोप था कि सरकार उनकी आवाज और भविष्य से जुड़े सवालों को गंभीरता से नहीं ले रही है।

एक दिन में बदल गया था आंदोलन का चेहरा

काठमांडू में प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव के बाद हालात बिगड़ गए। पुलिस की गोलीबारी में युवा प्रदर्शनकारी घायल हुए और एक दर्जन से अधिक की अस्पतालों में इलाज के दौरान मौत होने का उल्लेख लेख में है। इसके बाद कर्फ्यू भी युवाओं के आक्रोश को रोक नहीं सका। सरकार और प्रदर्शनकारियों के बीच संवाद नहीं बनने से स्थिति तेजी से नियंत्रण से बाहर होती चली गई। 9 सितंबर को नेपाल ने अभूतपूर्व हिंसा और अराजकता देखी। पुलिस चौकियों, राजनीतिक नेताओं के घरों, सिंह दरबार, सुप्रीम कोर्ट, संसद भवन, मंत्रियों के आवास, होटलों और सुपरमार्केट को निशाना बनाया गया। कई स्थानों पर तोड़फोड़, लूट और आगजनी हुई। हालात सामान्य करने के लिए आखिरकार नेपाल की सेना को सक्रिय होना पड़ा।

ओली का इस्तीफा, फिर बदल गई नेपाल की सत्ता

आंदोलन के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी ओली ने इस्तीफा दिया। इसके बाद पूर्व मुख्य न्यायाधीश सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार बनी और प्रतिनिधि सभा के चुनाव की घोषणा हुई। लेख के अनुसार बाद के राजनीतिक घटनाक्रम में काठमांडू के तत्कालीन मेयर बालेंद्र शाह राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी (RSP) में शामिल हुए, पार्टी सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत बनकर उभरी और बालेंद्र शाह के नेतृत्व में सरकार बनी।

क्यों भड़का था नेपाल का युवा?

लेख के मुताबिक नेपाल में युवाओं का असंतोष अचानक पैदा नहीं हुआ था। खराब शासन, जवाबदेही की कमी, भ्रष्टाचार और युवाओं के लिए अवसरों की कमी ने लंबे समय से नाराजगी पैदा कर रखी थी। सरकार की ओर से 26 सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर प्रतिबंध लगाने का फैसला इस गुस्से के लिए ट्रिगर साबित हुआ। लेख भारत और नेपाल की परिस्थितियों को समान नहीं मानता, लेकिन दोनों देशों में युवाओं की आकांक्षाओं में समानता जरूर बताता है। रोजगार, पारदर्शिता, जवाबदेह सरकार, भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था और अपने भविष्य की सुरक्षा युवाओं की प्रमुख अपेक्षाओं में शामिल हैं।

भारत के लिए नेपाल के अनुभव से तीन सबक

पहला सबक सरकार और युवाओं के बीच संवाद का है। युवाओं का असंतोष जब सामने आए तो उसे नजरअंदाज करने या उनकी आवाज को कमतर आंकने के बजाय समय रहते बातचीत जरूरी है। वहीं प्रदर्शनकारियों के लिए भी लोकतांत्रिक प्रक्रिया, संयम और दूसरे पक्ष की बात सुनना उतना ही महत्वपूर्ण है। दूसरा सबक यह है कि संस्थाओं में कमियां हो सकती हैं और उनमें सुधार की मांग भी जायज हो सकती है, लेकिन इमारतों और सार्वजनिक संपत्ति को नष्ट करना समाधान नहीं है। कुछ मिनटों की हिंसा देश की छवि और प्रतिष्ठा को लंबे समय तक नुकसान पहुंचा सकती है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सवाल सत्ता परिवर्तन के बाद का है। सरकार गिराना एक बात है, लेकिन सत्ता में आने के बाद जनता की अपेक्षाओं पर खरा उतरना बिल्कुल अलग चुनौती है। नेपाल में आंदोलन के बाद सत्ता में आए लोगों को भी अब अपने वादों को पूरा करने और खुद को पिछली व्यवस्था से अलग साबित करने की चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।

लोकतंत्र में विरोध अधिकार, हिंसा नहीं समाधान

लेख का निष्कर्ष लोकतांत्रिक व्यवस्था में सरकार और प्रदर्शनकारियों दोनों की जिम्मेदारी पर केंद्रित है। विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र में मौलिक अधिकार है, लेकिन शासन चलाने की जिम्मेदारी भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। सरकार यदि असहमति को खतरा समझने लगे और प्रदर्शनकारी विनाश को बदलाव का रास्ता मान लें तो इसका नुकसान अंततः लोकतांत्रिक व्यवस्था को होता है।

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