बरेली/प्रयागराज। सितंबर में बरेली में हुए दंगे के मास्टर माइंड आईएमसी प्रमुख मौलाना तौकीर रजा खान को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ा झटका लगा है। हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की लंबी सुनवाई के बाद उनकी जमानत याचिका खारिज कर दी। अदालत में सरकार की ओर से पेश किए गए साक्ष्यों और गवाहों, बरेली पुलिस की मजबूत कानूनी लिखा पढ़ी को महत्वपूर्ण मानते हुए न्यायालय ने राहत देने से इनकार कर दिया।
दंगे की साजिश के साक्ष्य अदालत में पेश
एसएसपी बरेली अनुराग आर्य के निर्देशन और क्षेत्राधिकारी नगर प्रथम आशुतोष शिवम के निकट पर्यवेक्षण में दंगे के सभी मामलों की विवेचना की गई थी। विवेचक संजय कुमार धीर ने केस डायरी के आधार पर न्यायालय के समक्ष तर्क रखा कि 26 सितंबर 2025 को हुए दंगे की योजना 19 सितंबर 2025 को फरीदापुर में बनाई गई थी। विवेचना के दौरान जुटाए गए साक्ष्यों के आधार पर अदालत को बताया गया कि दंगे के लिए पहले से तैयारी की गई, हथियार जुटाए गए, लोगों को उकसाया गया और भीड़ एकत्र करने के लिए संगठित प्रयास किए गए। पुलिस ने घटना से पहले और बाद के वीडियो व अन्य डिजिटल साक्ष्य भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए। साक्ष्य संकलन में उपनिरीक्षक त्रिवेंद्र कुमार की भी महत्वपूर्ण भूमिका रही।
बचाव पक्ष ने दी जमानत की दलील
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि मौलाना तौकीर रजा इस मुकदमे में नामजद आरोपी नहीं हैं और उनका नाम विवेचना के दौरान प्रकाश में आया है। साथ ही यह भी कहा गया कि इसी मामले में कई अन्य आरोपियों को जमानत और अग्रिम जमानत मिल चुकी है, इसलिए उन्हें भी राहत दी जानी चाहिए। बचाव पक्ष ने उन्हें किसी भी साजिश का हिस्सा मानने से इनकार किया।
सरकार ने बताया मुख्य षड्यंत्रकारी
सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता नितेश कुमार श्रीवास्तव ने अदालत में जोरदार पक्ष रखा। उन्होंने तर्क दिया कि 19 सितंबर से 26 सितंबर 2025 तक के पूरे घटनाक्रम में मौलाना तौकीर रजा की सक्रिय भूमिका रही। अदालत को बताया गया कि घटना के बाद जारी किए गए एक वीडियो और अन्य साक्ष्य यह संकेत देते हैं कि वह पूरे घटनाक्रम के मुख्य सूत्रधार और षड्यंत्रकारी थे। सरकारी पक्ष ने यह भी स्पष्ट किया कि भले ही एफआईआर में उनका नाम आरोपी के रूप में दर्ज न हो, लेकिन एफआईआर के विवरण और बाद में संकलित साक्ष्यों में उनकी भूमिका स्पष्ट रूप से सामने आई है। इसलिए उन्हें जमानत दिए जाने का कोई आधार नहीं बनता।
दोनों पक्षों की बहस के बाद फैसला
अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी के निर्देशन तथा एजीए प्रथम परितोष मालवीय के पर्यवेक्षण में सरकार का पक्ष रखा गया। न्यायमूर्ति ए.के.एस. देशवाल की एकलपीठ ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद मौलाना तौकीर रजा खान की जमानत याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट के इस फैसले को फरीदापुर दंगा प्रकरण की विवेचना और अभियोजन पक्ष के लिए महत्वपूर्ण सफलता माना जा रहा है।