ढाका। बांग्लादेश ने एक बार फिर चीन के साथ अपने रणनीतिक रिश्तों को मजबूत करने के संकेत दिए हैं। तीस्ता नदी प्रबंधन और बहाली परियोजना को लेकर ढाका ने औपचारिक रूप से चीन से सहयोग मांगा है। इस कदम को भारत के लिए अहम कूटनीतिक चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है, क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से इस परियोजना में चीन की भागीदारी को लेकर सतर्क रही है। बांग्लादेश के विदेश मंत्री खलीलुर रहमान ने बीजिंग दौरे के दौरान चीन के विदेश मंत्री वांग यी से मुलाकात की। दोनों नेताओं के बीच हुई बातचीत में तीस्ता नदी परियोजना प्रमुख मुद्दों में शामिल रही। संयुक्त बयान के अनुसार बांग्लादेश ने चीन से इस परियोजना में भागीदारी और तकनीकी सहयोग का अनुरोध किया है।
भारत ने भी जताई थी बातचीत की इच्छा
दिलचस्प बात यह है कि बांग्लादेश का यह कदम ऐसे समय आया है, जब भारत ने भी तीस्ता परियोजना पर बातचीत की इच्छा जताई थी। भारतीय विदेश सचिव विक्रम मिस्री ने हाल ही में कहा था कि भारत इस परियोजना को लेकर ढाका के साथ चर्चा आगे बढ़ाने को तैयार है।भारत पहले ही बांग्लादेश को अपना प्रस्ताव दे चुका है। माना जा रहा था कि नई सरकार इस मामले में नई दिल्ली के साथ आगे बढ़ सकती है, लेकिन चीन की ओर बढ़ते कदमों ने क्षेत्रीय राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।
यूनुस सरकार की नीति पर आगे बढ़ रही BNP
विशेषज्ञों का मानना है कि बांग्लादेश की नई सरकार पूर्व अंतरिम प्रमुख मोहम्मद यूनुस की बनाई कूटनीतिक दिशा को आगे बढ़ा रही है। मार्च 2025 में यूनुस ने चीन दौरे के दौरान तीस्ता परियोजना में बीजिंग की भूमिका का स्वागत किया था। इसके बाद बीएनपी नेता तारिक रहमान और पार्टी के अन्य नेताओं ने भी चीन के प्रस्ताव पर सकारात्मक रुख दिखाया था। अब नई सरकार के औपचारिक अनुरोध के बाद चीन की भूमिका और मजबूत होती दिखाई दे रही है।
भारत के लिए क्यों अहम है तीस्ता प्रोजेक्ट?
तीस्ता नदी भारत और बांग्लादेश दोनों के लिए महत्वपूर्ण जल स्रोत मानी जाती है। दोनों देशों के बीच जल बंटवारे का समझौता पिछले करीब 15 वर्षों से लंबित है। बांग्लादेश ने जल संरक्षण और नदी प्रबंधन को लेकर करीब 1 अरब डॉलर की लागत वाला तीस्ता मेगा प्रोजेक्ट तैयार किया है। इसमें नदी की खुदाई, जल भंडारण, तटबंध निर्माण और आसपास के इलाकों के विकास की योजना शामिल है। भारत की चिंता यह है कि यदि चीन इस परियोजना में बड़ी भूमिका निभाता है, तो दक्षिण एशिया में उसका रणनीतिक प्रभाव और बढ़ सकता है। खासतौर पर भारत के पूर्वोत्तर और बांग्लादेश सीमा के आसपास चीन की मौजूदगी को नई दिल्ली सुरक्षा और भू-राजनीतिक नजरिए से संवेदनशील मानता है।
क्षेत्रीय राजनीति पर पड़ सकता है असर
विशेषज्ञों का कहना है कि तीस्ता परियोजना सिर्फ जल प्रबंधन का मुद्दा नहीं रह गया है, बल्कि यह अब दक्षिण एशिया की बड़ी रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बन चुका है। आने वाले समय में भारत, चीन और बांग्लादेश के रिश्तों पर इसका असर साफ दिखाई दे सकता है।