लखनऊ। उत्तर प्रदेश की राजनीति से एक बेबाक और मुखर आवाज हमेशा के लिए खामोश हो गई। घोसी लोकसभा सीट से सांसद रहे और प्रदेश सरकार में मंत्री रह चुके हरिनारायण राजभर का रविवार दोपहर लखनऊ के एक निजी अस्पताल में निधन हो गया। 76 वर्ष की उम्र में उन्होंने इलाज के दौरान अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर फैलते ही पूर्वांचल की राजनीति में शोक की लहर दौड़ गई। समर्थकों, कार्यकर्ताओं और राजनीतिक गलियारों में गहरा दुख देखा जा रहा है।
अचानक बिगड़ी तबीयत, अस्पताल में तोड़ा दम
जानकारी के मुताबिक, हरिनारायण राजभर की तबीयत अचानक बिगड़ने पर परिजन उन्हें लखनऊ के एक निजी अस्पताल लेकर पहुंचे थे। डॉक्टरों की टीम लगातार उनका इलाज कर रही थी, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उन्हें बचाया नहीं जा सका। उनके निधन की खबर मिलते ही उनके पैतृक गांव टंगनिया (जनपद बलिया) में मातम छा गया। परिवार के लोग और समर्थक अंतिम दर्शन के लिए जुटने लगे हैं। सोशल मीडिया पर भी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने श्रद्धांजलि देना शुरू कर दिया है।
बेबाक अंदाज़ ने दिलाई अलग पहचान
हरिनारायण राजभर अपने बेबाक और स्पष्टवादी स्वभाव के लिए जाने जाते थे। वे बिना किसी लाग-लपेट के अपनी बात रखने के लिए पहचाने जाते थे। यही वजह थी कि कार्यकर्ताओं के बीच उनकी अलग ही पकड़ थी। पूर्वांचल के मऊ और बलिया जिलों में उनका राजनीतिक प्रभाव साफ तौर पर देखा जाता था। चाहे जनसमस्याओं का मुद्दा हो या संसद में बहस—राजभर हमेशा मुखर रहे। कई बार उनके बयान चर्चा और सुर्खियों का कारण भी बने।
दो बार विधायक, मंत्री के रूप में निभाई जिम्मेदारी
हरिनारायण राजभर का राजनीतिक सफर लंबा और सक्रिय रहा। वे दो बार उत्तर प्रदेश विधानसभा के सदस्य चुने गए। इसके अलावा उन्होंने राज्य सरकार में कारागार, लघु सिंचाई और ग्रामीण विकास राज्य मंत्री के रूप में भी जिम्मेदारी संभाली। अपने कार्यकाल में उन्होंने ग्रामीण विकास और सिंचाई से जुड़े मुद्दों पर काम किया। क्षेत्रीय स्तर पर जनता की समस्याओं को लेकर वे लगातार सक्रिय रहते थे।
2014 में रचा इतिहास, घोसी में पहली बार खिला कमल
घोसी लोकसभा सीट लंबे समय तक कम्युनिस्टों और अन्य दलों का गढ़ मानी जाती रही। लेकिन साल 2014 के लोकसभा चुनाव में हरिनारायण राजभर ने इस धारणा को तोड़ दिया। उन्होंने भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ते हुए कड़े मुकाबले में जीत हासिल की और पहली बार इस सीट पर कमल खिलाया। उस चुनाव में उन्होंने दिग्गज नेता दारा सिंह चौहान को हराया था।mयह जीत भाजपा के लिए बेहद खास थी, क्योंकि इससे पहले पार्टी कभी भी इस सीट पर जीत दर्ज नहीं कर सकी थी।
संसदीय समितियों में निभाई अहम भूमिका
सांसद बनने के बाद हरिनारायण राजभर ने कई महत्वपूर्ण संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। वे विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, पर्यावरण एवं वन संबंधी स्थायी समिति के सदस्य रहे। इसके अलावा उन्होंने रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय की सलाहकार समिति में भी अपनी भागीदारी दी। इन मंचों पर उन्होंने क्षेत्रीय और राष्ट्रीय मुद्दों को मजबूती से उठाया।
संसद में ‘पुरुष आयोग’ की मांग से बटोरी सुर्खियां
हरिनारायण राजभर का एक बयान संसद में काफी चर्चा में रहा। साल 2018 में उन्होंने महिला आयोग की तर्ज पर पुरुष आयोग बनाने की मांग उठाई थी। उन्होंने तर्क दिया था कि कई मामलों में पुरुष भी प्रताड़ना का शिकार होते हैं, लेकिन उनके लिए कोई मंच नहीं है। इस मुद्दे को उठाते वक्त सदन में ठहाके भी लगे, लेकिन राजभर ने अपनी बात पूरी मजबूती से रखी। इस घटना ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई और उनकी बेबाक छवि और मजबूत हुई।
2019 और 2024 में बदली सियासी तस्वीर
2014 की ऐतिहासिक जीत के बाद 2019 में घोसी सीट पर राजनीतिक समीकरण बदल गए। इस बार भाजपा को हार का सामना करना पड़ा और जीत गठबंधन के उम्मीदवार अतुल राय के खाते में गई। इसके बाद 2024 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा इस सीट पर जीत हासिल नहीं कर सकी। समाजवादी पार्टी के उम्मीदवार राजीव राय ने सीट अपने नाम कर ली। इसके बावजूद हरिनारायण राजभर का नाम इस सीट के इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा, क्योंकि उन्होंने यहां पहली बार भाजपा की जीत का परचम लहराया था।
समर्थकों और राजनीतिक जगत में शोक की लहर
हरिनारायण राजभर के निधन से पूर्वांचल की राजनीति को बड़ा झटका लगा है। उनके समर्थकों के बीच गहरा दुख देखा जा रहा है। राजनीतिक दलों के नेताओं ने भी उनके निधन पर शोक व्यक्त किया है। उनके योगदान को याद करते हुए उन्हें एक जुझारू और जमीनी नेता बताया जा रहा है।
जनता से जुड़ा रहा पूरा जीवन
हरिनारायण राजभर का पूरा राजनीतिक जीवन जनता के बीच ही बीता। वे हमेशा आम लोगों के मुद्दों को प्राथमिकता देते थे। ग्रामीण इलाकों में विकास, सिंचाई और बुनियादी सुविधाओं को लेकर उन्होंने लगातार आवाज उठाई। यही वजह थी कि वे क्षेत्र में लोकप्रिय नेता के रूप में जाने जाते थे।