नई दिल्ली। धार्मिक स्थलों में महिलाओं के प्रवेश और धार्मिक स्वतंत्रता बनाम समानता के अधिकार की बहस पर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों वाली संविधान पीठ ने मंगलवार से अहम सुनवाई शुरू कर दी है। सबरीमाला मंदिर से जुड़े इस केस में अब देशभर के कई धार्मिक स्थलों—मस्जिद, दरगाह और पारसी अगियारी—से जुड़े संवैधानिक सवाल भी शामिल हो गए हैं।
9 जजों की बेंच तय करेगी सीमा और अधिकार
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई में 9 जजों की संविधान पीठ इस मामले की सुनवाई कर रही है। यह सुनवाई 7 अप्रैल से शुरू होकर 22 अप्रैल तक चलने की संभावना है। अदालत इस दौरान धार्मिक स्वतंत्रता, समानता और न्यायिक दखल की सीमाओं को लेकर बड़ा फैसला दे सकती है।
केंद्र सरकार ने क्या रखा पक्ष?
सुनवाई से पहले केंद्र सरकार ने कोर्ट में कहा कि सबरीमाला मंदिर में मासिक धर्म आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश पर रोक धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मामला है। केंद्र ने इस पर न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने और परंपरा को बरकरार रखने की मांग की है।
2018 का फैसला बना आधार, 2019 में बड़ा मोड़
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से 10 से 50 वर्ष की महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। कोर्ट ने इसे असंवैधानिक बताया था। इसके बाद 2019 में मामला बड़े संवैधानिक सवालों के साथ 9 जजों की पीठ को सौंप दिया गया।
अब इन 7 बड़े सवालों पर होगी सुनवाई
संविधान पीठ के सामने सबसे अहम 7 सवाल हैं—
- अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा क्या है?
- अनुच्छेद 25 और 26 के अधिकारों का आपसी संबंध क्या है?
- क्या धार्मिक संप्रदायों के अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों के अधीन हैं?
- ‘नैतिकता’ का मतलब क्या है—क्या इसमें संवैधानिक नैतिकता भी शामिल है?
- धार्मिक प्रथाओं पर कोर्ट की समीक्षा की सीमा क्या होनी चाहिए?
- “हिंदुओं के वर्ग” (Sections of Hindus) का क्या अर्थ है?
- क्या कोई बाहरी व्यक्ति किसी धार्मिक प्रथा को PIL के जरिए चुनौती दे सकता है?
देशभर के धार्मिक स्थलों पर पड़ेगा असर
यह मामला सिर्फ सबरीमाला मंदिर तक सीमित नहीं है। इसके फैसले का असर मस्जिदों, दरगाहों और पारसी अगियारियों में महिलाओं के प्रवेश जैसे मामलों पर भी पड़ेगा।
समानता बनाम आस्था—देश देख रहा सुप्रीम फैसला
यह सुनवाई देश के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक—आस्था और समानता के टकराव—पर निर्णायक दिशा तय कर सकती है। अब निगाहें सुप्रीम कोर्ट के अंतिम फैसले पर टिकी हैं, जो आने वाले समय में धार्मिक परंपराओं और महिलाओं के अधिकारों के बीच संतुलन तय करेगा।