NEW DELHIनोएल टाटा और एन. चंद्रशेखरन

नई दिल्ली। टाटा संस के नेतृत्व को लेकर लंबे समय से चल रही अटकलों के बीच बोर्ड ने एन. चंद्रशेखरन पर एक बार फिर भरोसा जताया है। बोर्ड ने उन्हें अगले पांच साल के लिए चेयरमैन बनाए रखने के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी। हालांकि टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने इस फैसले का विरोध किया। बोर्ड के अन्य सदस्यों ने चंद्रशेखरन के पक्ष में मतदान किया। उनके नए कार्यकाल से जुड़े प्रस्ताव पर अभी कंपनी की सालाना आम बैठक में मंजूरी की प्रक्रिया बाकी है।

सबसे अहम बात यह है कि चंद्रशेखरन ने अगस्त 2026 में संकेत दिया था कि फरवरी 2027 में अपना मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद वह पद पर बने नहीं रहना चाहते। इसके बावजूद बोर्ड ने उन्हें पांच साल और जिम्मेदारी देने का फैसला किया है। इसी मुद्दे को लेकर नोएल टाटा और बोर्ड के अन्य सदस्यों की राय अलग-अलग सामने आई।

नोएल टाटा का सवाल- जब छोड़ना चाहते थे पद तो उत्तराधिकारी क्यों नहीं?

नोएल टाटा ने चंद्रशेखरन को पांच साल का नया कार्यकाल देने के प्रस्ताव का समर्थन नहीं किया। उनका मत है कि जब चंद्रशेखरन खुद पद छोड़ने की इच्छा जता चुके थे, तब बोर्ड को उनके उत्तराधिकारी की तलाश करनी चाहिए थी। उम्र को लेकर भी सवाल उठाया गया है। चंद्रशेखरन अभी करीब 63 वर्ष के हैं। नया कार्यकाल पूरा होने तक उनकी उम्र करीब 70 वर्ष हो जाएगी। इसी वजह से नेतृत्व और उत्तराधिकार की भविष्य की व्यवस्था को लेकर चर्चा तेज हुई है।

IPO की तैयारी के बीच नेतृत्व में निरंतरता पर जोर

बोर्ड की बैठक में चंद्रशेखरन के कार्यकाल के साथ टाटा संस की संभावित लिस्टिंग पर भी चर्चा हुई। कंपनी की नियामकीय स्थिति और भारतीय रिजर्व बैंक से जुड़े मामले के कारण लिस्टिंग का सवाल पिछले कुछ समय से महत्वपूर्ण बना हुआ है। टाटा संस को सितंबर 2022 में अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया गया था। कंपनी ने अपनी नियामकीय स्थिति में बदलाव के लिए आवेदन किया था। इस मामले में RBI के रुख के बाद टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर गतिविधियां तेज हुई हैं। ऐसे महत्वपूर्ण दौर में बोर्ड के अधिकांश सदस्यों ने नेतृत्व में निरंतरता के लिए चंद्रशेखरन पर भरोसा जताया है।

2017 से टाटा संस की कमान संभाल रहे चंद्रशेखरन

एन. चंद्रशेखरन करीब चार दशक से टाटा समूह से जुड़े हैं। उन्होंने टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज (TCS) से अपने करियर की शुरुआत की और बाद में कंपनी के सीईओ एवं प्रबंध निदेशक बने। फरवरी 2017 में उन्हें पहली बार टाटा संस का चेयरमैन बनाया गया। उनके कार्यकाल में टाटा समूह ने एअर इंडिया का अधिग्रहण किया और डिजिटल कारोबार के साथ सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, बैटरी और इलेक्ट्रिक मोबिलिटी जैसे क्षेत्रों में निवेश बढ़ाया। समूह का राजस्व वित्त वर्ष 2020 के करीब 7.89 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2026 में 16 लाख करोड़ रुपये से अधिक बताया गया है। इसी अवधि में सूचीबद्ध टाटा कंपनियों के संयुक्त बाजार पूंजीकरण में भी बड़ी वृद्धि हुई।

टाटा संस की लिस्टिंग पर इसलिए टिकी निगाहें

टाटा संस टाटा समूह की मुख्य होल्डिंग और प्रमोटर कंपनी है। मार्च 2026 तक इसका असेट बेस करीब 2.01 लाख करोड़ रुपये बताया गया है। बाजार विशेषज्ञ संभावित लिस्टिंग की स्थिति में इसके मूल्यांकन को कई लाख करोड़ रुपये आंक रहे हैं। टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स की है। शापूरजी पालोनजी समूह की हिस्सेदारी करीब 18.37 प्रतिशत है। इसके अलावा टाटा समूह की कुछ कंपनियों के पास भी टाटा संस के शेयर हैं। यदि टाटा संस शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है तो यह भारतीय कॉरपोरेट जगत की सबसे महत्वपूर्ण लिस्टिंग में से एक हो सकती है।

रणनीति और खर्च को लेकर भी सामने आए मतभेद

चंद्रशेखरन और नोएल टाटा के बीच मतभेद केवल उत्तराधिकार तक सीमित नहीं बताए जा रहे हैं। पिछले कुछ समय से समूह के कुछ नए कारोबारों में निवेश, एअर इंडिया और डिजिटल कारोबार के वित्तीय प्रदर्शन, पूंजीगत खर्च तथा निगरानी जैसे मुद्दों पर भी दोनों पक्षों के दृष्टिकोण में अंतर की खबरें सामने आती रही हैं। नोएल टाटा टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन हैं। टाटा ट्रस्ट्स के पास टाटा संस की करीब दो-तिहाई हिस्सेदारी होने के कारण समूह की संरचना में उनकी भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

टाटा ग्रुप, टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स में क्या अंतर?

टाटा ग्रुप: टाटा ब्रांड के तहत काम करने वाली कंपनियों का समूह है। इसमें TCS, टाटा मोटर्स, टाटा स्टील, टाटा पावर, टाइटन, एअर इंडिया और ट्रेंट समेत कई कंपनियां शामिल हैं।

टाटा संस: यह समूह की प्रमुख होल्डिंग और प्रमोटर कंपनी है। समूह की रणनीतिक दिशा, बड़े निवेश और टाटा ब्रांड से जुड़े कई महत्वपूर्ण फैसलों में इसकी केंद्रीय भूमिका है।

टाटा ट्रस्ट्स: सर दोराबजी टाटा ट्रस्ट और सर रतन टाटा ट्रस्ट समेत विभिन्न परोपकारी ट्रस्टों का समूह है। इनके पास टाटा संस की करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी है। ट्रस्ट शिक्षा, स्वास्थ्य, ग्रामीण विकास और सामाजिक कल्याण के क्षेत्रों में काम करते हैं।

अब AGM पर रहेंगी निगाहें

बोर्ड से चंद्रशेखरन के पक्ष में प्रस्ताव पारित होने के बाद अब आगे की कॉरपोरेट मंजूरी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। दूसरी ओर टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और समूह के भविष्य के नेतृत्व को लेकर भी निगाहें टिकी रहेंगी। चंद्रशेखरन को नया कार्यकाल देने पर नोएल टाटा की अलग राय ने यह जरूर साफ कर दिया है कि टाटा समूह के शीर्ष स्तर पर उत्तराधिकार और भविष्य की रणनीति को लेकर एकमत स्थिति नहीं है।

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