बरेली। जिले में झोलाछाप डॉक्टरों पर शिकंजा कसने के लिए स्वास्थ्य विभाग ने दो-दो नोडल अधिकारी तैनात कर रखे हैं, लेकिन जमीन पर हालात इसके उलट नजर आ रहे हैं। कहीं गलत ऑपरेशन के बाद मरीज की मौत हो रही है तो कहीं गलत इंजेक्शन जानलेवा साबित हो रहा है। अब दो माह की गर्भवती के इलाज में गंभीर लापरवाही और मौत के आरोपों ने एक बार फिर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा कर दिया है। सवाल यह है कि जब निगरानी के लिए अधिकारी तैनात हैं तो झोलाछापों का नेटवर्क आखिर किसके संरक्षण में फल-फूल रहा है और न जाने अगला शिकार कौन होगा।
सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह ने जिले में झोलाछाप डॉक्टरों से जुड़े मामलों और स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी के लिए डॉ. सुचिता गंगवार और डॉ. लईक अंसारी को जिम्मेदारियां दे रखी हैं। डॉ. सुचिता गंगवार झोलाछाप और आईजीआरएस की नोडल अधिकारी हैं, जबकि डॉ. लईक अंसारी 50 बेड तक के अस्पतालों के पंजीकरण से संबंधित जिम्मेदारी देखते हैं। विभागीय सूत्रों के मुताबिक डॉ. सुचिता गंगवार की करीब दो महीने पहले ही बरेली में तैनाती हुई है। ऐसे में झोलाछापों से जुड़े मामलों में डॉ. लईक अंसारी को अच्छा अनुभव और ज्यादा जानकारी है इस वजह से उनके साथ काम देखते हैं। इसके बावजूद लगातार सामने आ रहे मामलों ने विभाग की निगरानी और कार्रवाई की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
गलत ऑपरेशन के बाद अजय की मौत, तीन महीने जिंदगी से लड़ता रहा
डोहरा रोड गौटिया निवासी अजय को पेट दर्द और हाइड्रोसील की शिकायत थी। परिजनों का आरोप है कि वह इलाज के लिए कथित झोलाछाप जयवीर के पास पहुंचा, जहां करीब 20 हजार रुपये लेकर उसका ऑपरेशन कर दिया गया। आरोप है कि गलत ऑपरेशन के कारण अजय की आंतों में गंभीर संक्रमण फैल गया और उसकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई। इसके बाद परिजन उसे दूसरे अस्पतालों में लेकर भटकते रहे। करीब तीन महीने तक अजय जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष करता रहा, लेकिन मार्च 2026 में उसकी मौत हो गई। मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने कथित झोलाछाप के क्लीनिक को सील किया था। इस घटना ने सवाल खड़ा किया कि बिना पर्याप्त चिकित्सकीय योग्यता के ऑपरेशन करने की नौबत आखिर कैसे आई और विभाग को इसकी जानकारी मरीज की हालत बिगड़ने के बाद ही क्यों हुई।
इंजेक्शन लगाते ही बिगड़ी बुजुर्ग प्रेमवती की हालत, चली गई जान
अप्रैल 2026 में बहेड़ी थाना क्षेत्र में झोलाछाप के कथित गलत इलाज से मौत का दूसरा गंभीर मामला सामने आया। करीब 60 वर्षीय प्रेमवती को उपचार के लिए एक कथित झोलाछाप के पास ले जाया गया था। परिजनों का आरोप है कि झोलाछाप ने महिला को इंजेक्शन लगाया, जिसके बाद अचानक उसकी हालत बिगड़ गई और कुछ ही देर में उसकी मौत हो गई। महिला की मौत से आक्रोशित परिजनों ने मौके पर हंगामा किया और संबंधित डॉक्टर पर गलत इंजेक्शन लगाने का आरोप लगाते हुए पुलिस से शिकायत की। घटना के बाद एक बार फिर ग्रामीण क्षेत्रों में बिना पर्याप्त योग्यता और जांच के मरीजों को इंजेक्शन व दवाएं देने वाले कथित झोलाछापों की निगरानी पर सवाल उठे।
बुखार में मासूम को लगाया इंजेक्शन, हालत हो गई गंभीर
जून 2026 की शुरुआत में झोलाछाप के इलाज से जुड़ा तीसरा मामला एक मासूम बच्चे का सामने आया। बच्चा बुखार से पीड़ित था और परिजन उसे उपचार के लिए कथित झोलाछाप के पास लेकर पहुंचे थे। आरोप है कि बच्चे की पर्याप्त जांच किए बिना उसे इंजेक्शन लगा दिया गया। इसके बाद उसकी हालत तेजी से बिगड़ गई और वह गंभीर स्थिति में पहुंच गया। बच्चे की हालत बिगड़ने के बाद परिजनों को उसे बेहतर उपचार के लिए दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। इस घटना ने एक बार फिर सवाल खड़ा किया कि बच्चों जैसे संवेदनशील मरीजों का इलाज करने वाले ऐसे लोगों की योग्यता और क्लीनिकों की जांच स्वास्थ्य विभाग समय रहते क्यों नहीं कर पा रहा है।
दो माह की गर्भवती का पेट खोलने का आरोप
चौथा और बेहद गंभीर मामला बदायूं के बिनावर थाना क्षेत्र के गुझियाना गांव निवासी पूनम पत्नी बिजेंद्र कुमार का है। पिता दीनदयाल के मुताबिक पूनम करीब दो माह की गर्भवती थी और मायके आई हुई थी। पेट में दर्द होने पर परिचित ओमपाल ने अपनी रिश्तेदार नीरज से इलाज कराने की सलाह दी। आरोप है कि नीरज पूनम को बल्लिया में अल्ट्रासाउंड कराने ले गई और इसके बाद उसके पेट की सफाई कर दी। इसके बाद पूनम की हालत तेजी से बिगड़ गई। परिजन उसे बरेली के बेगराज अस्पताल लेकर पहुंचे, जहां जांच और अल्ट्रासाउंड के बाद परिजनों को उसकी आंत और बच्चेदानी फटने की बात बताए जाने का दावा है। इसके बाद उसे रुहेलखंड अस्पताल में भर्ती कराया गया, जहां ऑपरेशन किया गया, लेकिन परिजनों के मुताबिक तब तक संक्रमण शरीर में फैल चुका था। तमाम प्रयासों के बावजूद 10 जुलाई की रात करीब 8:05 बजे पूनम की मौत हो गई।
500 से ज्यादा अवैध क्लीनिक सक्रिय होने का दावा
विभागीय सूत्रों और आंतरिक सर्वे से जुड़े दावों के मुताबिक बहेड़ी, फरीदपुर, भोजीपुरा, नवाबगंज, भमोरा, सीबीगंज, फतेहगंज पश्चिमी समेत ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में 500 से अधिक अवैध क्लीनिक और कथित झोलाछाप सक्रिय हो सकते हैं। दावा है कि इस वर्ष 40 से अधिक अवैध क्लीनिकों को सील किया है और करीब 12 मामलों में नामजद एफआईआर दर्ज कराई गई है। हालांकि इन आंकड़ों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हो सकी है। इसके बावजूद बड़ा सवाल कायम है कि अगर लगातार छापेमारी और सीलिंग हो रही है तो झोलाछापों का नेटवर्क खत्म क्यों नहीं हो रहा? कार्रवाई के बाद क्लीनिक दोबारा खुल रहे हैं या नहीं, इसकी निगरानी कौन कर रहा है? और जिन मामलों में मरीजों की मौत के आरोप लगे, उनमें जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया कहां तक पहुंची?
डॉ लईक ने किया किनारा, सीएमओ, नोडल ने नहीं उठाया फोन
लगातार सामने आ रहे मामलों, झोलाछापों के खिलाफ हुई कार्रवाई और विभाग पर लग रहे आरोपों को लेकर सीएमओ डॉ. विश्राम सिंह और डॉ. सुचिता गंगवार से फोन पर संपर्क करने का प्रयास किया गया, लेकिन दोनों अधिकारियों ने फोन रिसीव नहीं किया। इस कारण उनका पक्ष नहीं मिल सका। वहीं नोडल अधिकारी डॉ. लईक अहमद अंसारी ने कहा कि उनके पास झोलाछाप नोडल की जिम्मेदारी नहीं हैं, इस मामले में डॉक्टर सुचिता बयान देंगी।