नई दिल्ली। विदेश में उच्च शिक्षा हासिल कर बेहतर करियर बनाने का सपना देखने वाले भारतीय छात्रों के सामने अब नई चुनौतियां खड़ी हो गई हैं। अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पढ़ाई पूरी करने के बाद भी बड़ी संख्या में छात्रों को उनकी योग्यता के अनुरूप नौकरी नहीं मिल रही है। हालात ऐसे हैं कि कई छात्र मजबूरी में डिलीवरी बॉय और अन्य गिग इकोनॉमी से जुड़े काम करने को विवश हो रहे हैं।

दुनियाभर में करीब 12 लाख भारतीय छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। इनमें अधिकांश अमेरिका, कनाडा, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। हालांकि वैश्विक स्तर पर कमजोर पड़ते जॉब मार्केट, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के कारण बढ़ती छंटनी, कड़े होते वीजा नियम और गिरते भारतीय रुपये ने छात्रों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं।

स्किल जॉब की जगह गिग इकोनॉमी का सहारा

बीबीसी की एक रिपोर्ट के अनुसार, बड़ी संख्या में भारतीय छात्र अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद भी मनचाही नौकरी हासिल नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में वे फूड डिलीवरी, पैकेज डिलीवरी और अन्य अस्थायी काम कर जीविका चला रहे हैं। अमेरिका के वॉशिंगटन स्थित नॉर्थ अमेरिका एसोसिएशन ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स के संस्थापक सुधांशु कौशिक का कहना है कि भारतीय छात्र विशेष कौशल आधारित नौकरियों की उम्मीद लेकर विदेश जाते हैं, लेकिन नौकरी न मिलने पर उन्हें गिग इकोनॉमी का हिस्सा बनना पड़ता है। पहले ऐसे काम छात्र पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए करते थे, लेकिन अब कई लोग डिग्री पूरी होने के बाद भी इन्हीं नौकरियों में फंसे हुए हैं।

वीजा नियम और महंगी पढ़ाई बनी बड़ी बाधा

विशेषज्ञों के मुताबिक अमेरिका और ब्रिटेन में वीजा नियम सख्त होने के कारण पिछले दो वर्षों में विदेशी विश्वविद्यालयों में भारतीय छात्रों के दाखिले में करीब 20 प्रतिशत तक कमी आई है। ब्रिटेन की 76 प्रतिशत यूनिवर्सिटीज ने जनवरी इनटेक में भारतीय छात्रों की संख्या घटने की जानकारी दी है। वहीं फरवरी 2025 से फरवरी 2026 के बीच अमेरिका में भारतीय छात्रों के एडमिशन में करीब 7 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है।

गिरते रुपये ने बढ़ाया आर्थिक बोझ

स्टडी अब्रॉड विशेषज्ञ सुशील सुखवानी के अनुसार, भारतीय रुपये की लगातार गिरती कीमत ने विदेश में पढ़ाई को और महंगा बना दिया है। पिछले एक वर्ष में डॉलर के मुकाबले रुपये में 10 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है। इससे पहले से विदेश में पढ़ रहे छात्रों को भी अतिरिक्त लोन और फंड की व्यवस्था करनी पड़ रही है। विशेषज्ञों का कहना है कि वर्ष 2019 के बाद से प्रमुख विदेशी मुद्राओं के मुकाबले भारतीय रुपये की कीमत में 35 से 47 प्रतिशत तक गिरावट आई है। ऐसे में अब कई परिवार विदेश में पढ़ाई पर होने वाले भारी खर्च और नौकरी की अनिश्चितता को देखते हुए अपने बच्चों को बाहर भेजने से पहले दोबारा सोच रहे हैं।

विदेशी पढ़ाई पर उठने लगे सवाल

रोजगार के सीमित अवसर, बढ़ती लागत और कड़े इमिग्रेशन नियमों के चलते अब भारतीय छात्रों और उनके परिवारों के बीच यह सवाल तेजी से उठ रहा है कि क्या विदेशी डिग्री पर लाखों रुपये खर्च करना वास्तव में फायदे का सौदा रह गया है। नौकरी की गारंटी न होने से विदेश में पढ़ाई का आकर्षण धीरे-धीरे कम होता दिखाई दे रहा है।

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