बरेली। स्मार्ट सिटी मिशन के तहत डीडीपुरम स्थित कुष्ठ आश्रम की भूमि पर विकसित किए जा रहे फूड कोर्ट प्रोजेक्ट पर अब शासन की नजर टेढ़ी हो गई है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार इस परियोजना में वित्तीय अनियमितताओं, स्ट्रीट वेंडरों के अधिकारों की अनदेखी, सरकारी धन की क्षति और नियमों के उल्लंघन के आरोपों के बाद शासन ने जांच के आदेश जारी कर दिए हैं। आदेश जारी होते ही बरेली स्मार्ट सिटी लिमिटेड और संबंधित अधिकारियों में हड़कंप मच गया है।

राज्य मिशन निदेशक, स्मार्ट सिटी मिशन उत्तर प्रदेश ने मंडलायुक्त एवं बरेली स्मार्ट सिटी लिमिटेड के अध्यक्ष से पूरे मामले की बिंदुवार जांच कर विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। रिपोर्ट में प्रत्येक आरोप पर स्पष्ट टिप्पणी और संस्तुति देने को कहा गया है।

3.02 करोड़ रुपये के उपयोग पर उठे सवाल

शासन को भेजी गई शिकायत में आरोप लगाया गया है कि फूड कोर्ट परियोजना में करीब 3.02 करोड़ रुपये खर्च किए गए, लेकिन परियोजना के उद्देश्य और उसके क्रियान्वयन के बीच बड़ा अंतर दिखाई दे रहा है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि जिस योजना का उद्देश्य स्ट्रीट वेंडरों को व्यवस्थित रोजगार उपलब्ध कराना था, वहां उनके हितों की अनदेखी हुई है। रूहेलखंड उद्योग व्यापार मंडल के प्रदेश अध्यक्ष राजकुमार महरोत्रा द्वारा प्रमुख सचिव नगर विकास को भेजी गई शिकायत के बाद नगर विकास विभाग ने मामले को गंभीरता से लिया और जांच प्रक्रिया शुरू कराई।

37 हजार रुपये महीना और 15 साल का ठेका

फूड कोर्ट परियोजना पहले भी विवादों में रही है। बरेली स्मार्ट सिटी लिमिटेड ने 5 नवंबर 2024 को मल्टीलेवल कार पार्किंग, फूड कोर्ट परिसर और लाइट एंड साउंड शो के संचालन का अनुबंध एक निजी कंपनी से किया था। आरोप है कि बेशकीमती सरकारी भूमि पर स्थित इस परिसर का ठेका मात्र 37 हजार रुपये प्रतिमाह किराये पर 15 वर्षों के लिए दे दिया गया। इसी बिंदु को लेकर शिकायतकर्ताओं ने राजस्व हानि और सार्वजनिक संपत्ति के उपयोग पर सवाल उठाए हैं।

फूड कोर्ट में गारमेंट शोरूम की तैयारी पर सवाल

जांच का एक बड़ा बिंदु यह भी है कि जिस परिसर को खानपान और स्ट्रीट फूड गतिविधियों के लिए विकसित किया गया था, वहां रेडीमेड गारमेंट शोरूम संचालित करने की तैयारी कैसे की जा रही है। शिकायत में कहा गया है कि यदि फूड कोर्ट का उपयोग अन्य व्यावसायिक गतिविधियों के लिए किया जा रहा है तो यह परियोजना की मूल अवधारणा के विपरीत है।

फायर सेफ्टी और नक्शे पर भी उठी उंगली

शिकायत में यह भी आरोप लगाया गया है कि परियोजना में फायर सेफ्टी मानकों का समुचित पालन नहीं किया गया। निर्माण स्थल पर अग्नि सुरक्षा व्यवस्था, आपातकालीन निकास और भवन मानकों को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए गए हैं। साथ ही यह भी आरोप है कि संबंधित नक्शा और अन्य तकनीकी स्वीकृतियों की स्थिति स्पष्ट नहीं है।

बार और शराब दुकान की चर्चाओं ने बढ़ाई हलचल

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि भविष्य में परिसर में बार या शराब से जुड़ी गतिविधियों को अनुमति देने की योजना हो सकती है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन शिकायतकर्ताओं ने जांच एजेंसियों से इस पहलू की भी पड़ताल कराने की मांग की है।

स्ट्रीट वेंडरों के पुनर्वास पर बड़ा सवाल

फूड कोर्ट परियोजना का सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य स्ट्रीट वेंडरों को व्यवस्थित स्थान और रोजगार उपलब्ध कराना बताया गया था। शिकायत में दावा किया गया है कि जिन लोगों के पुनर्वास के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, उन्हें अपेक्षित लाभ नहीं मिला। इससे परियोजना की उपयोगिता और उद्देश्य दोनों सवालों के घेरे में आ गए हैं।

शासन को भेजी जाएगी तथ्यात्मक रिपोर्ट

शासन के निर्देश के बाद स्मार्ट सिटी और प्रशासनिक अधिकारियों ने मामले की जांच शुरू कर दी है। अब सभी आरोपों की तथ्यात्मक जांच कर रिपोर्ट शासन को भेजी जाएगी। रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई तय होगी। ऐसे में आने वाले दिनों में फूड कोर्ट परियोजना से जुड़े कई अहम तथ्य सामने आने की संभावना है।

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