नई दिल्ली। मौत की सजा पाए कैदियों को फांसी देने की मौजूदा व्यवस्था फिलहाल जारी रहेगी। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को फांसी के जरिए मृत्युदंड देने के तरीके को खत्म करने की मांग वाली याचिका खारिज कर दी। हालांकि शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार के लिए यह रास्ता खुला रखा है कि वह विशेषज्ञों की मदद से ऐसे वैकल्पिक तरीकों की जांच कर सकती है, जिनमें दोषी को अपेक्षाकृत कम पीड़ा हो और अंतिम समय तक उसकी गरिमा भी बनी रहे।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि मौजूदा स्तर पर फांसी के तरीके में न्यायिक हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं है। कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि भविष्य में यदि ठोस वैज्ञानिक और मेडिकल साक्ष्य सामने आते हैं तो इस मुद्दे की दोबारा संवैधानिक कसौटी पर समीक्षा का रास्ता बंद नहीं होगा।
फांसी को अनुच्छेद 21 के आधार पर दी गई थी चुनौती
वरिष्ठ अधिवक्ता ऋषि मल्होत्रा की ओर से दायर याचिका में फांसी के जरिए मृत्युदंड देने की संवैधानिक वैधता पर सवाल उठाया गया था। दलील दी गई कि फांसी की प्रक्रिया में दोषी को लंबे समय तक शारीरिक दर्द और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ सकता है। याचिका में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार के साथ मानवीय गरिमा का मुद्दा उठाया गया। मांग की गई थी कि फांसी के बजाय जहरीले इंजेक्शन, गोली मारने, बिजली या गैस चैंबर जैसे दूसरे विकल्पों की वैज्ञानिक आधार पर पड़ताल की जाए।
नए कानून में भी फांसी का ही प्रावधान
पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 354(5) में मृत्युदंड पाए व्यक्ति को गर्दन से तब तक लटकाने का प्रावधान था, जब तक उसकी मृत्यु न हो जाए। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में भी यह व्यवस्था बरकरार रखी गई है और इसका प्रावधान धारा 393(5) में किया गया है। सुप्रीम कोर्ट इससे पहले वर्ष 1983 के दीना बनाम भारत संघ मामले में भी फांसी के जरिए मृत्युदंड देने की संवैधानिक वैधता को बरकरार रख चुका है।
केंद्र चाहे तो एक्सपर्ट कमेटी से तलाश सकता है विकल्प
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए सरकार के स्तर पर विकल्प तलाशने की गुंजाइश बरकरार रखी है। वर्ष 2023 में तत्कालीन अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने अदालत को बताया था कि केंद्र सरकार फांसी के दूसरे विकल्पों की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने पर विचार कर रही है। 2026 की सुनवाई के दौरान भी सरकार की ओर से बताया गया कि इस विषय की उच्च स्तर पर पड़ताल की जा रही है। कोर्ट के फैसले के बाद केंद्र सरकार चाहे तो मेडिकल, वैज्ञानिक और कानूनी विशेषज्ञों की मदद से मृत्युदंड के दूसरे तरीकों की व्यवहारिकता और मानवीय पहलुओं का अध्ययन करा सकती है।
2003 में विधि आयोग ने सुझाया था घातक इंजेक्शन
मृत्युदंड के तरीके को बदलने का मुद्दा नया नहीं है। वर्ष 2003 में विधि आयोग ने अपनी 187वीं रिपोर्ट में फांसी के साथ घातक इंजेक्शन को भी वैकल्पिक तरीका बनाए जाने की सिफारिश की थी। इसके पीछे मेडिकल साइंस और तकनीक में आए बदलावों को आधार बनाया गया था। हालांकि घातक इंजेक्शन को भी पूरी तरह पीड़ारहित विकल्प मानने पर सवाल उठते रहे हैं। सुनवाई के दौरान Project 39A की ओर से अमेरिका समेत दूसरे देशों के अनुभवों का हवाला देते हुए कहा गया कि लेथल इंजेक्शन से मृत्युदंड की प्रक्रिया भी कई मामलों में विवादों से घिरी रही है।
अभी नहीं बदलेगा तरीका, भविष्य के लिए खुला रहेगा दरवाजा
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद भारत में मृत्युदंड देने की मौजूदा प्रक्रिया में तत्काल कोई बदलाव नहीं होगा और कानून के तहत फांसी का प्रावधान जारी रहेगा। हालांकि शीर्ष अदालत ने भविष्य के लिए दरवाजा खुला रखा है। यदि नए और ठोस वैज्ञानिक या मेडिकल प्रमाण यह स्थापित करते हैं कि कोई दूसरा तरीका कम पीड़ादायक और अधिक गरिमापूर्ण है, तो फांसी के तरीके की संवैधानिक वैधता पर दोबारा विचार किया जा सकता है।