नई दिल्ली। भारत और फ्रांस के बीच प्रस्तावित 114 राफेल लड़ाकू विमानों की बड़ी डील एक अहम मोड़ पर आकर अटक गई है। अरबों डॉलर के इस सौदे में सबसे बड़ा विवाद ‘सोर्स कोड’ और टेक्नोलॉजी ट्रांसफर को लेकर सामने आया है। फ्रांस जहां इस कोड को साझा करने से बच रहा है, वहीं भारत अपनी शर्तों पर अड़ा हुआ है।
रूस कनेक्शन से जुड़ा फ्रांस का डर
यूक्रेनी अखबार ‘डिफेंस एक्सप्रेस’ की रिपोर्ट के मुताबिक फ्रांस की इस हिचक के पीछे रूस का फैक्टर अहम माना जा रहा है। रिपोर्ट में दावा किया गया है कि भारत के रूस के साथ करीबी रक्षा संबंधों के कारण फ्रांस को आशंका है कि राफेल का संवेदनशील सॉफ्टवेयर कोड कहीं तीसरे देश तक न पहुंच जाए।
क्या है ‘सोर्स कोड’ और क्यों है इतना अहम
राफेल विमान का ‘सोर्स कोड’ उसके ऑनबोर्ड सिस्टम का सबसे संवेदनशील हिस्सा होता है। इसके जरिए विमान के सॉफ्टवेयर को अपडेट, मॉडिफाई और कंट्रोल किया जाता है। भारत चाहता है कि उसे इस कोड तक पूरी पहुंच मिले ताकि वह अपने हथियार और सिस्टम स्वतंत्र रूप से जोड़ सके।
डील में फंसे कई बड़े पेंच
करीब 35-40 अरब डॉलर की इस डील में भारत चाहता है कि:
- वह अपने हथियार (जैसे स्वदेशी मिसाइल) जोड़ सके
- इलेक्ट्रॉनिक वारफेयर सिस्टम को खुद अपडेट कर सके
- भविष्य में सॉफ्टवेयर बदलाव के लिए फ्रांस पर निर्भर न रहना पड़े
लेकिन फ्रांस इसे अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मामला मानते हुए पूरी एक्सेस देने से बच रहा है।
भारत में ही बनेंगे ज्यादातर राफेल
डील के तहत 114 में से 96 विमान भारत में ही असेंबल किए जाएंगे। शुरुआत में करीब 30% पुर्जे भारतीय होंगे, जिसे आगे बढ़ाकर 60% तक ले जाने की योजना है। इससे ‘मेक इन इंडिया’ को बड़ा बढ़ावा मिलने की उम्मीद है।
विशेषज्ञों की सलाह—पुरानी गलती न दोहराए भारत
पूर्व फाइटर पायलट विजयेन्द्र के ठाकुर का कहना है कि भारत को इस बार कॉन्ट्रैक्ट में साफ-साफ शर्तें तय करनी चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी कि सॉफ्टवेयर की लागत विमान की कुल कीमत का 40-50% तक होती है, इसलिए भविष्य में यह बड़ा विवाद बन सकता है।
डील पर दुनिया की नजर, लेकिन फैसला बाकी
राफेल डील को लेकर दुनियाभर की नजरें टिकी हुई हैं, लेकिन अप्रैल की शुरुआत तक इस पर कोई ठोस प्रगति सामने नहीं आई है। अब सबकी नजर इस बात पर है कि क्या फ्रांस अपनी शर्तों में ढील देगा या भारत अपने रुख पर कायम रहेगा।