नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में छिड़े संघर्ष ने अब भारत की खेती पर सीधा खतरा खड़ा कर दिया है। ईरान युद्ध के बीच कच्चे तेल-गैस के साथ अब उर्वरक सप्लाई पर भी संकट गहराने लगा है। हालात ऐसे हैं कि भारत को फर्टिलाइजर के लिए मिशन मोड में उतरना पड़ा है और दुनिया के करीब 20 देशों में भारतीय दूतावास एक्टिव होकर सप्लाई सुनिश्चित करने में जुट गए हैं।
युद्ध का असर: खेत तक पहुंचा संकट
ईरान-अमेरिका-इजरायल टकराव का असर अब कृषि सेक्टर तक साफ दिखने लगा है। उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी गैस और कच्चे माल की सप्लाई प्रभावित हो रही है। इससे खासतौर पर नाइट्रोजन और फॉस्फेट आधारित खाद की उपलब्धता पर दबाव बढ़ गया है। चिंता इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि खरीफ सीजन से ठीक पहले यह संकट सामने आया है।
20 देशों में ‘डिप्लोमैटिक ड्राइव’
सूत्रों के मुताबिक, भारत ने खाद आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए वैश्विक स्तर पर बड़ा अभियान छेड़ दिया है। रूस, इंडोनेशिया, मलेशिया, वियतनाम, अल्जीरिया और मिस्र जैसे देशों से यूरिया और डीएपी की आपूर्ति बढ़ाने पर बातचीत चल रही है। वहीं मोरक्को, जॉर्डन और बेलारूस से भी आयात के विकल्प तलाशे जा रहे हैं।
पश्चिम एशिया पर भारी निर्भरता
अब तक भारत की करीब 30% यूरिया और 30% डीएपी की जरूरतें पश्चिम एशिया के देशों—सऊदी अरब, कतर, ओमान और यूएई—से पूरी होती रही हैं। इसके अलावा उर्वरक उत्पादन के लिए जरूरी एलएनजी का भी बड़ा हिस्सा इसी क्षेत्र से आता है। ऐसे में यहां सप्लाई बाधित होना भारत के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है।
रूस ने दिया भरोसा, सप्लाई बढ़ाने का वादा
रूस ने भारत को राहत देते हुए उर्वरक आपूर्ति बढ़ाने का भरोसा दिया है। रूसी उप प्रधानमंत्री डेनिस मंतुरोव ने पीएम नरेंद्र मोदी को आश्वस्त किया कि दिसंबर 2025 से रूस ने भारत को खनिज उर्वरकों की सप्लाई 40% तक बढ़ा दी है और आगे भी जरूरत पूरी करने को तैयार है।
लंबी रणनीति: विदेश में ही बनेगा यूरिया प्लांट
भारत सिर्फ आयात पर निर्भर नहीं रहना चाहता, बल्कि दीर्घकालिक समाधान पर भी काम कर रहा है। आरसीएफ, एनएफएल और आईपीएल ने रूस की यूरालकेम कंपनी के साथ मिलकर यूरिया प्लांट लगाने का समझौता किया है। करीब 1.2 अरब डॉलर की इस परियोजना से 2027-28 तक सालाना 20 लाख टन यूरिया उत्पादन का लक्ष्य है।
अफ्रीका से मजबूत हो रहे रिश्ते
भारत उत्तरी अफ्रीका, खासकर मिस्र और मोरक्को के साथ भी उर्वरक सहयोग मजबूत कर रहा है। 2024 में मिस्र से आयात 29 मिलियन डॉलर से ज्यादा रहा और स्वेज नहर क्षेत्र में 4.5 अरब डॉलर तक के निवेश की योजना भी बनाई जा रही है। इससे भविष्य में सप्लाई सुरक्षित रखने में मदद मिलेगी।