नई दिल्ली। बदलते युद्ध के दौर में जहां दुश्मन सस्ते ड्रोन के झुंड से हमला कर रहा है, वहीं भारत ने इसका करारा जवाब तैयार कर लिया है। रूस से तुंगुस्का एयर डिफेंस सिस्टम की खरीद सिर्फ एक डील नहीं, बल्कि आने वाले खतरों के खिलाफ एक मजबूत कवच है, जो S-400 जैसे हाईटेक सिस्टम की भी सुरक्षा करेगा।
डील पर मुहर… भारत ने रूस से खरीदी ‘ड्रोन किलर’ ताकत
भारत ने अपनी वायु रक्षा को और मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए रूस के साथ 445 करोड़ रुपये की डील साइन की है। इस समझौते के तहत भारतीय सेना को तुंगुस्का एयर डिफेंस मिसाइल सिस्टम का अपग्रेडेड वर्जन मिलेगा। यह सिस्टम खासतौर पर आधुनिक युद्ध में बढ़ते ड्रोन खतरे से निपटने के लिए डिजाइन किया गया है। रक्षा मंत्रालय के इस फैसले को रणनीतिक रूप से बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि अब युद्ध सिर्फ बड़े हथियारों से नहीं, बल्कि सस्ते और तेजी से तैनात होने वाले ड्रोन से भी लड़ा जा रहा है।
‘ऑपरेशन सिंदूर’ ने खोली आंखें… ड्रोन खतरे का असली अहसास
हाल के सैन्य अभियानों, खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान भारत ने महसूस किया कि दुश्मन सस्ते ड्रोन के झुंड के जरिए भी बड़े पैमाने पर नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर सकता है। पाकिस्तान द्वारा तुर्की से खरीदे गए ड्रोन के इस्तेमाल ने यह साफ कर दिया कि भविष्य के युद्धों में ड्रोन सबसे बड़ा हथियार बन सकते हैं। यही वजह है कि भारत ने अपनी रणनीति बदलते हुए ऐसे सिस्टम को प्राथमिकता दी है, जो इन छोटे लेकिन खतरनाक हमलों को तुरंत नाकाम कर सके।
S-400 की ढाल बनेगा तुंगुस्का… मल्टी-लेयर डिफेंस की ताकत
तुंगुस्का सिस्टम को भारत की मल्टी-लेयर एयर डिफेंस रणनीति का अहम हिस्सा माना जा रहा है। जहां S-400 जैसे सिस्टम लंबी दूरी और बड़े हवाई खतरों से निपटने के लिए हैं, वहीं तुंगुस्का नजदीकी और कम ऊंचाई वाले लक्ष्यों को खत्म करने में माहिर है। यह सिस्टम S-400 के लिए एक सुरक्षात्मक घेरा तैयार करेगा, जिससे दुश्मन के ड्रोन या लो-फ्लाइंग टारगेट बड़े सिस्टम तक पहुंच ही नहीं पाएंगे। इस तरह दोनों सिस्टम मिलकर एक अभेद्य सुरक्षा कवच तैयार करेंगे।
छोटे लक्ष्य, बड़ा वार… ड्रोन, हेलिकॉप्टर और क्रूज मिसाइल पर सटीक निशाना
तुंगुस्का एयर डिफेंस सिस्टम खासतौर पर उन खतरों के लिए तैयार किया गया है, जो रडार से बचकर कम ऊंचाई पर हमला करते हैं। यह सिस्टम ड्रोन, हेलिकॉप्टर और क्रूज मिसाइल जैसे लक्ष्यों को बेहद सटीकता से निशाना बना सकता है। इसकी खासियत यह है कि यह छोटे और धीमी गति वाले टारगेट को भी पहचान कर तुरंत खत्म कर देता है। यही कारण है कि इसे ‘ड्रोन किलर’ के नाम से भी जाना जाता है।
तकनीक का कमाल… 360 डिग्री नजर और सटीक फायर कंट्रोल
इस सिस्टम में लगे 360 डिग्री टारगेट एक्विजिशन रडार 18 किलोमीटर दूर तक खतरे का पता लगा सकते हैं। इसके अलावा ट्रैकिंग रडार और डिजिटल फायर कंट्रोल सिस्टम इसे बेहद सटीक बनाते हैं। तुंगुस्का रेडियो कमांड गाइडेंस से संचालित होता है, जिससे यह लक्ष्य को लॉक करके उसे नष्ट करने में सक्षम होता है। यह 8 से 10 किलोमीटर की दूरी और करीब 3,500 मीटर की ऊंचाई तक के टारगेट को आसानी से मार गिरा सकता है।
मोबाइल प्लेटफॉर्म और जबरदस्त फायरपावर… मिनटों में तबाही
तुंगुस्का सिस्टम की सबसे बड़ी ताकत इसकी मोबाइल क्षमता है। इसे आसानी से एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है, जिससे यह युद्ध के दौरान तेजी से तैनात हो सकता है। इसमें लगी दो 30 मिमी तोपें प्रति मिनट 3,900 से 5,000 राउंड तक फायर कर सकती हैं, जो ड्रोन के झुंड को कुछ ही सेकंड में खत्म करने के लिए काफी है। यही नहीं, यह सिस्टम लगातार फायरिंग के दौरान भी अपनी सटीकता बनाए रखता है।