राज्यसभा में सोमवार को ऐसा सियासी तूफान उठा, जिसने सरकार की बड़ी योजना को ही ठहराव पर ला दिया। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (CAPF) विधेयक को पेश करने से पहले ही विपक्ष ने 48 घंटे वाले नियम का मुद्दा उठाकर जोरदार विरोध किया। हालात ऐसे बने कि सरकार को कदम पीछे खींचने पड़े और संसद में एक नया टकराव खुलकर सामने आ गया।
48 घंटे का नियम बना टकराव की असली चिंगारी
राज्यसभा में CAPF बिल को लेकर जो विवाद भड़का, उसकी जड़ एक तकनीकी लेकिन बेहद अहम संसदीय नियम में छिपी थी—48 घंटे का नियम। विपक्षी दलों का आरोप था कि विधेयक की प्रति सांसदों को निर्धारित समय सीमा से पहले उपलब्ध नहीं कराई गई, जो संसदीय परंपराओं का सीधा उल्लंघन है। इस मुद्दे ने अचानक तूल पकड़ लिया और सदन का माहौल गरमा गया। विपक्ष ने इसे सिर्फ प्रक्रिया की चूक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी करार दिया।
विपक्ष का हंगामा, वॉकआउट से बढ़ा दबाव
तृणमूल कांग्रेस के सांसद डेरेक ओ’ब्रायन ने सबसे पहले इस मुद्दे को जोरदार तरीके से उठाया। उनके साथ कांग्रेस, आम आदमी पार्टी और CPI(M) समेत कई दल खुलकर सामने आ गए। विपक्षी सांसदों ने सरकार पर जल्दबाजी में कानून पास कराने की कोशिश का आरोप लगाया। हंगामा इतना बढ़ा कि कई सांसदों ने वॉकआउट कर दिया। इस विरोध ने सरकार पर तत्काल दबाव बना दिया और बिल की पेशी को टालना पड़ा।
सरकार बैकफुट पर, सहमति बनाने की कोशिश
स्थिति बिगड़ती देख सरकार ने फिलहाल CAPF बिल को पेश करने का फैसला टाल दिया। एक वरिष्ठ मंत्री ने स्वीकार किया कि कुछ मतभेद सामने आए हैं, जिन्हें सुलझाना जरूरी है। इसके बाद गृह मंत्री अमित शाह ने विपक्षी नेताओं के साथ बैठक कर रास्ता निकालने की कोशिश की। संसदीय कार्य मंत्री किरण रिजिजू भी इस बातचीत में शामिल रहे। दूसरी ओर विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे ने भी अलग रणनीति बैठक कर सरकार पर दबाव बनाए रखने की योजना बनाई।
आखिर क्या है CAPF बिल, क्यों है इतना अहम?
प्रस्तावित CAPF बिल का उद्देश्य देश के पांच प्रमुख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल—CRPF, BSF, ITBP, SSB और CISF—के लिए एकीकृत प्रशासनिक ढांचा तैयार करना है। अभी ये सभी बल अलग-अलग कानूनों के तहत संचालित होते हैं, जिससे कई प्रशासनिक जटिलताएं पैदा होती हैं। इस बिल के जरिए भर्ती, प्रमोशन, डेपुटेशन और सेवा शर्तों को एक समान करने का प्रस्ताव है, ताकि संचालन अधिक प्रभावी और पारदर्शी बन सके।
IPS बनाम CAPF—विवाद की असली जड़
इस विधेयक में सबसे ज्यादा विवाद IPS अधिकारियों की भूमिका को लेकर है। प्रस्ताव के मुताबिक IG स्तर के 50% पद IPS अधिकारियों से भरे जाएंगे, जबकि ADG स्तर पर यह आंकड़ा 67% तक होगा। शीर्ष पद—SDG और DG—पूरी तरह IPS के लिए आरक्षित रखने का प्रावधान है। CAPF के अंदर ही इसको लेकर असंतोष बढ़ रहा है, क्योंकि इससे उनके अधिकारियों के प्रमोशन के अवसर सीमित होने की आशंका जताई जा रही है। यही वजह है कि यह बिल सिर्फ राजनीतिक नहीं, बल्कि प्रशासनिक विवाद का भी केंद्र बन गया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उलझा मामला, आगे क्या?
यह विधेयक सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले के बाद लाया गया था, जिसमें CAPF में IPS अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति को सीमित करने और कैडर समीक्षा के निर्देश दिए गए थे। लेकिन मौजूदा प्रस्ताव इन निर्देशों के उलट नजर आ रहा है, जिससे विवाद और गहरा गया है। अब नजर इस बात पर है कि सरकार और विपक्ष के बीच कब सहमति बनती है। फिलहाल यह साफ है कि CAPF बिल अब सिर्फ एक कानून नहीं, बल्कि सियासी और प्रशासनिक शक्ति संतुलन की बड़ी लड़ाई बन चुका है।