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बरेली में एक खामोश खतरा तेजी से बढ़ रहा है—मोबाइल स्क्रीन के भीतर कैद होती जा रही ‘जेन-जी’। ऑनलाइन गेमिंग, सोशल मीडिया और नशे की लत ने युवाओं को इस कदर जकड़ लिया है कि अब मानसिक अस्पतालों की ओपीडी में हर तीसरा मरीज युवा है। सवाल बड़ा है—क्या यह डिजिटल लत आने वाली पीढ़ी का भविष्य छीन रही है?

मोबाइल-गेमिंग का जाल, जेन-जी फंसी ‘डिजिटल कैद’ में

बरेली में तेजी से बदलती जीवनशैली ने युवाओं को स्क्रीन का गुलाम बना दिया है। स्मार्टफोन, ऑनलाइन गेमिंग और सोशल मीडिया अब उनकी दिनचर्या का सबसे बड़ा हिस्सा बन चुके हैं। जहां पहले बच्चे मैदान में खेलते नजर आते थे, वहीं अब घंटों मोबाइल स्क्रीन पर नजरें गड़ाए रहते हैं। यह बदलाव सिर्फ आदत नहीं, बल्कि एक गंभीर समस्या बनता जा रहा है, जो युवाओं के मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित कर रहा है।

आउटडोर खेल खत्म, शरीर हो रहा कमजोर

क्रिकेट, फुटबॉल, कबड्डी जैसे पारंपरिक खेल अब युवाओं की जिंदगी से लगभग गायब हो चुके हैं। उनकी जगह ऑनलाइन गेमिंग ने ले ली है, जिसमें न तो शारीरिक मेहनत है और न ही सामाजिक संपर्क। विशेषज्ञों का कहना है कि लगातार बैठे रहने और फिजिकल एक्टिविटी की कमी से युवाओं का शारीरिक विकास प्रभावित हो रहा है। मोटापा, कमजोरी और फिटनेस की गिरावट अब कम उम्र में ही देखने को मिल रही है, जो भविष्य के लिए खतरे की घंटी है।

गुस्सा, चिड़चिड़ापन और आक्रामकता—नई पहचान

मेंटल हेल्थ विशेषज्ञों के अनुसार, ज्यादा स्क्रीन टाइम और गेमिंग का सीधा असर युवाओं के व्यवहार पर पड़ रहा है। छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, झुंझलाहट, आक्रामक रवैया और सामाजिक दूरी अब आम हो गई है। कई मामलों में युवा खुद पर नियंत्रण खो देते हैं और परिवार या दोस्तों से टकराव बढ़ जाता है। यह बदलाव धीरे-धीरे मानसिक बीमारियों का रूप ले रहा है, जिसे नजरअंदाज करना खतरनाक साबित हो सकता है।

मेंटल हॉस्पिटल की ओपीडी में 30% जेन-जी, आंकड़े चौंकाने वाले

बरेली के मानसिक अस्पताल में सामने आए आंकड़े बेहद चिंताजनक हैं। ओपीडी में आने वाले मरीजों में करीब 30 प्रतिशत 16 से 25 वर्ष के युवा हैं। डॉक्टर आलोक शुक्ला के मुताबिक, कोविड के बाद यह संख्या तेजी से बढ़ी है। इनमें लगभग 50 प्रतिशत महिलाएं और करीब 10 प्रतिशत बच्चे भी शामिल हैं। यह आंकड़े इस बात का संकेत हैं कि मानसिक स्वास्थ्य संकट अब सिर्फ बुजुर्गों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि नई पीढ़ी इसकी सबसे बड़ी शिकार बनती जा रही है।

सोशल मीडिया और ड्रग्स—डबल खतरा

विशेषज्ञों का मानना है कि मोबाइल और सोशल मीडिया का अत्यधिक उपयोग युवाओं में तुलना, असुरक्षा और तनाव को बढ़ा रहा है। ‘लाइक्स’ और ‘फॉलोअर्स’ की दौड़ उन्हें मानसिक दबाव में डाल रही है। इसके साथ ही कई मामलों में ड्रग एडिक्शन भी बड़ी वजह बनकर सामने आ रहा है। अस्पताल में आने वाले करीब 30 प्रतिशत मामलों में नशे की लत जुड़ी हुई है। कई युवा घर-परिवार होते हुए भी भटकाव का शिकार हो रहे हैं, जो समाज के लिए गंभीर संकेत है।

दिमाग और शरीर पर डबल अटैक, भविष्य पर खतरा

गैजेट्स और गेमिंग का असर सिर्फ मानसिक स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह शरीर पर भी गहरा प्रभाव डाल रहा है। फिजिकल एक्टिविटी की कमी से शरीर कमजोर हो रहा है, वहीं मानसिक तनाव, ओवरथिंकिंग और नींद की कमी से दिमाग पर दबाव बढ़ रहा है। यह ‘डबल अटैक’ युवाओं के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि अगर समय रहते इस पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।

डि-एडिक्शन सेंटर से उम्मीद, डॉक्टरों की साफ सलाह

इस बढ़ते संकट से निपटने के लिए मानसिक अस्पताल में एम्स की मदद से डि-एडिक्शन सेंटर तैयार किया गया है, जो जल्द शुरू होगा। इससे नशे और डिजिटल लत से जूझ रहे युवाओं को राहत मिलने की उम्मीद है। डॉक्टरों ने युवाओं और अभिभावकों को सलाह दी है कि स्क्रीन टाइम सीमित करें, आउटडोर गतिविधियों को बढ़ावा दें, परिवार के साथ समय बिताएं और मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें। यह सिर्फ सलाह नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ी को बचाने का जरूरी कदम है।

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