वॉशिंगटन। पश्चिम एशिया में जारी भीषण युद्ध के बीच एक बड़ा सवाल उठ रहा है—क्या अमेरिका और इजरायल ईरान में फेल हो गए हैं? लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि असली तस्वीर कुछ और है। तेहरान की सैन्य ताकत धीरे-धीरे खत्म हो रही है और यह सब एक सुनियोजित रणनीति के तहत हो रहा है।
युद्ध का असली चेहरा… ‘फेल’ नहीं, बदल रही है रणनीति
ईरान के खिलाफ अमेरिका और इजरायल के सैन्य अभियान को लेकर वैश्विक स्तर पर बहस तेज हो गई है। सत्ता परिवर्तन जैसे बड़े लक्ष्य हासिल न होने के कारण कई लोग इस मिशन को असफल मान रहे हैं, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति के जानकारों का नजरिया इससे अलग है। विशेषज्ञ मुहानद सेलम के अनुसार, यह युद्ध केवल सरकार बदलने का नहीं, बल्कि ईरान की सैन्य और रणनीतिक क्षमता को कमजोर करने का अभियान है। यही कारण है कि भले ही कुछ मोर्चों पर नतीजे तुरंत दिखाई न दें, लेकिन अंदर ही अंदर ईरान की ताकत लगातार कमजोर हो रही है।
मिसाइल, नेवी और एयर डिफेंस पर वार… ‘रीढ़’ पर सीधा हमला
विश्लेषण के मुताबिक, ईरान की दशकों में तैयार की गई सैन्य शक्ति अब धीरे-धीरे खत्म हो रही है। उसके बैलिस्टिक मिसाइल जखीरे, परमाणु ढांचे, हवाई सुरक्षा सिस्टम और नौसेना क्षमताओं को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। खासतौर पर ईरान के फास्ट-अटैक क्राफ्ट, छोटी पनडुब्बियां और माइन बिछाने की क्षमता को खत्म किया जा रहा है। स्थिति इतनी गंभीर हो गई है कि अमेरिका खुले तौर पर ईरानी एयरस्पेस में अपने बमवर्षक विमान उड़ा रहा है, जो इस बात का संकेत है कि ईरान की एयर डिफेंस प्रणाली काफी कमजोर पड़ चुकी है।
दो फेज में हमला… पहले ‘अंधा’, अब ‘अपंग’ किया जा रहा ईरान
इस युद्ध को दो अलग-अलग चरणों में बांटा गया है। पहले चरण में ईरान के एयर डिफेंस सिस्टम, कमांड और कंट्रोल नेटवर्क को ध्वस्त किया गया, जिससे उसकी प्रतिक्रिया देने की क्षमता कमजोर हो गई। इसके बाद दूसरे चरण में उसके डिफेंस इंडस्ट्रियल बेस को निशाना बनाया जा रहा है। मिसाइल बनाने वाली फैक्ट्रियां, रिसर्च सेंटर और भूमिगत ठिकाने लगातार हमलों की जद में हैं। यह कोई अनियोजित हमला नहीं, बल्कि एक व्यवस्थित रणनीति है, जिसका मकसद ईरान को लंबे समय तक कमजोर बनाए रखना है।
रणनीतिक दुविधा में फंसा तेहरान… ‘चलाएं तो भी खतरा, बचाएं तो भी’
ईरान अब एक ऐसी स्थिति में पहुंच गया है, जहां उसके हर कदम में जोखिम है। अगर वह अपनी बची हुई मिसाइलें इस्तेमाल करता है, तो उनके लॉन्चर तुरंत दुश्मन के निशाने पर आ जाते हैं। वहीं अगर वह उन्हें बचाकर रखता है, तो उसकी जवाबी क्षमता कमजोर पड़ती जाती है। विशेषज्ञों का मानना है कि अब ईरान अपनी बची हुई ताकत को बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल कर रहा है और हमलों को राजनीतिक समय के अनुसार सीमित कर रहा है। यह दिखाता है कि वह लगातार दबाव में है।