बरेली। भारत के महान अभियंता, दूरदर्शी राष्ट्रनिर्माता और भारत रत्न से सम्मानित सर मोक्षगुंडम विश्वेश्वरैया की जयंती के रूप में मनाया जाता है। यही दिन देश में इंजीनियर्स डे के तौर पर भी समर्पित है। विश्वेश्वरैया का जीवन तकनीकी दक्षता, अनुशासन, नवाचार और राष्ट्रहित के लिए समर्पण का प्रेरणादायी उदाहरण है। हालांकि भारत में इंजीनियरिंग और निर्माण की परंपरा को केवल आधुनिक युग तक सीमित नहीं किया जा सकता। इसकी ऐतिहासिक जड़ें प्राचीन भारतीय ज्ञान, वास्तुकला और जल प्रबंधन की परंपराओं तक जाती हैं।
भगवान विश्वकर्मा: भारतीय परंपरा के दिव्य वास्तुकार
भारतीय पौराणिक परंपरा में भगवान विश्वकर्मा को वास्तु और निर्माण-कला का महान आचार्य माना गया है। विभिन्न धार्मिक ग्रंथों और लोक परंपराओं में उन्हें देवताओं के वास्तुकार तथा दिव्य निर्माण-कौशल के प्रतीक के रूप में वर्णित किया गया है। द्वारका, लंका और इन्द्रप्रस्थ जैसे नगरों के निर्माण से जुड़ी कथाएं भारतीय सांस्कृतिक चेतना में उनकी तकनीकी प्रतिभा की कल्पना को दर्शाती हैं। अस्त्र-शस्त्र, भवन निर्माण और विभिन्न दिव्य उपकरणों से जुड़ी कथाएं भी विश्वकर्मा को कुशल शिल्पकार के रूप में स्थापित करती हैं।
शुल्ब सूत्रों में छिपा था प्राचीन भारत का ज्यामितीय ज्ञान
प्राचीन भारत में यज्ञ वेदियों के निर्माण के लिए शुल्ब सूत्रों में ज्यामितीय नियमों का उल्लेख मिलता है। इनमें रेखाओं, कोणों, लंबाई और क्षेत्रफल की गणना से संबंधित महत्वपूर्ण गणितीय विधियां दिखाई देती हैं। यही परंपरा भारतीय गणित और ज्यामिति के विकास की महत्वपूर्ण कड़ी मानी जाती है। शुल्ब सूत्रों में समकोण त्रिभुज से संबंधित वह प्रसिद्ध संबंध भी मिलता है जिसे आज सामान्यतः पाइथागोरस प्रमेय के रूप में जाना जाता है।
हड़प्पा सभ्यता ने दिखाया उन्नत नगर नियोजन का रास्ता
भारत की प्राचीन सभ्यताओं में नगर नियोजन और जल प्रबंधन की उल्लेखनीय परंपरा दिखाई देती है। हड़प्पा सभ्यता के नगरों में योजनाबद्ध सड़कों, जल निकासी व्यवस्था, कुओं और सुव्यवस्थित आवासीय संरचनाओं के प्रमाण मिले हैं। मोहनजोदड़ो और धोलावीरा जैसे स्थलों की संरचनाएं यह बताती हैं कि हजारों वर्ष पहले भी जल संरक्षण, निकासी और नगरीय व्यवस्था को लेकर गंभीर तकनीकी सोच मौजूद थी।
जल प्रबंधन में भी प्राचीन भारत की दूरदर्शिता
भारत में प्राचीन समय से ही जल संरक्षण और सिंचाई को विशेष महत्व दिया गया। कुएं, तालाब, बावड़ियां, जलाशय और विभिन्न प्रकार की जल संरचनाएं स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप विकसित की गईं। यह परंपरा आज के जल संकट और टिकाऊ विकास के दौर में भी महत्वपूर्ण सीख देती है।
विश्वेश्वरैया ने आधुनिक भारत के इंजीनियरिंग सपनों को दी दिशा
इसी लंबी तकनीकी परंपरा को आधुनिक भारत में सर एम. विश्वेश्वरैया ने नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया। उन्होंने इंजीनियरिंग को केवल निर्माण का माध्यम नहीं माना, बल्कि इसे आर्थिक विकास, सिंचाई, जल प्रबंधन और राष्ट्र निर्माण से जोड़ा। उनके कार्यों में तकनीकी दक्षता के साथ-साथ समय, संसाधनों और सार्वजनिक हित के प्रति गहरी प्रतिबद्धता दिखाई देती है।
कृष्णराज सागर बांध बना इंजीनियरिंग प्रतिभा की पहचान
मैसूर क्षेत्र में कृष्णराज सागर बांध (KRS Dam) के निर्माण और सिंचाई व्यवस्था में विश्वेश्वरैया की भूमिका ने उन्हें देश के महान अभियंताओं में स्थापित किया। जल संसाधनों के बेहतर उपयोग और सिंचाई क्षमता बढ़ाने के प्रयासों ने क्षेत्र के कृषि और आर्थिक विकास को नई दिशा देने में योगदान दिया।
स्वचालित स्लूज गेट्स से दिखाई तकनीकी नवाचार की ताकत
विश्वेश्वरैया के नाम से जुड़े स्वचालित जल-नियंत्रण द्वारों के नवाचार ने भी उनकी इंजीनियरिंग प्रतिभा को पहचान दिलाई। जलाशयों में जलस्तर नियंत्रित करने की तकनीक ने जल प्रबंधन को अधिक व्यवस्थित बनाने में मदद की। उनके कार्य यह संदेश देते हैं कि एक सच्चा अभियंता केवल समस्या का समाधान नहीं करता, बल्कि भविष्य की जरूरतों को भी ध्यान में रखकर नई तकनीक विकसित करता है।
अनुशासन और ईमानदारी को बनाया इंजीनियरिंग का आधार
विश्वेश्वरैया का जीवन केवल बांधों और तकनीकी परियोजनाओं की कहानी नहीं है। वह अनुशासन, समय की पाबंदी, कार्य के प्रति निष्ठा और सार्वजनिक हित के लिए समर्पण का उदाहरण भी है। उनकी सोच में विकास का उद्देश्य केवल भौतिक निर्माण नहीं, बल्कि समाज और देश को आगे बढ़ाना था।
AI और रोबोटिक्स के दौर में भी पुराना ज्ञान प्रासंगिक
आज भारत आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, रोबोटिक्स, स्मार्ट सिटी, हाईवे, एक्सप्रेसवे, मेट्रो और आधुनिक जल प्रबंधन जैसी तकनीकों के क्षेत्र में तेजी से आगे बढ़ रहा है। ऐसे समय में भारत की प्राचीन गणितीय, वास्तु और जल प्रबंधन परंपराओं को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़कर देखना भविष्य के लिए नई संभावनाएं पैदा कर सकता है।
प्राचीन विरासत और आधुनिक विज्ञान के संगम से बनेगा नया भारत
विश्वेश्वरैया जयंती हमें केवल एक महान अभियंता को याद करने का अवसर नहीं देती, बल्कि यह भी याद दिलाती है कि ज्ञान, नवाचार और राष्ट्र निर्माण की यात्रा निरंतर चलती रहती है। भारत की प्राचीन वैज्ञानिक परंपराओं से प्रेरणा लेते हुए आधुनिक तकनीक का उपयोग जनकल्याण, टिकाऊ विकास और मजबूत बुनियादी ढांचे के निर्माण में किया जाए तो देश को नई ऊंचाइयों तक ले जाया जा सकता है। संदेश साफ है-ज्ञान पुराना हो सकता है, लेकिन नवाचार की कोई उम्र नहीं होती। भारत की प्राचीन वैज्ञानिक दृष्टि और आधुनिक तकनीक का संगम ही विकसित, आत्मनिर्भर और सशक्त भारत की मजबूत नींव बन सकता है।