google.com, pub-7697724059714638, DIRECT, f08c47fec0942fa0
UP NEWSधर्मेन्द्र कश्यप और अखिलेश यादव

बरेली। पूर्व भाजपा सांसद धर्मेन्द्र कश्यप की समाजवादी पार्टी में वापसी की तैयारी ने बरेली की चुनावी बिसात पर हलचल तेज कर दी है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव से मुलाकात के बाद उन्होंने बेटी कीर्ति कश्यप को 2027 में बिथरी चैनपुर विधानसभा सीट से चुनाव लड़ाने का ऐलान किया है। इस घोषणा ने भाजपा के सामने अपनी सीट बचाने की चुनौती बढ़ने के संकेत दिए हैं। धर्मेन्द्र का व्यक्तिगत जनाधार और कश्यप समाज में उनके समर्थकों का एक हिस्सा सपा के साथ जुड़ता है तो इसका असर बिथरी के अलावा आसपास की सीटों पर भी पड़ सकता है।

धर्मेन्द्र कश्यप के मुताबिक, अखिलेश यादव से बातचीत हो चुकी है और वह जल्द औपचारिक रूप से सपा में शामिल होंगे। उन्होंने अधिवक्ता बेटी कीर्ति को बिथरी चैनपुर से पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ाने की बात कही है। हालांकि सपा ने अभी इस सीट पर कीर्ति की उम्मीदवारी की औपचारिक घोषणा नहीं की है।

कीर्ति कश्यप और डॉ. राघवेंद्र शर्मा

भाजपा के कब्जे वाली बिथरी पर सपा की नई घेराबंदी

बिथरी चैनपुर से फिलहाल भाजपा के डॉ. राघवेंद्र शर्मा विधायक हैं। ऐसे में धर्मेन्द्र की सक्रियता और कीर्ति को मैदान में उतारने की तैयारी सीधे भाजपा के कब्जे वाली सीट पर चुनौती खड़ी करने की कोशिश है। सपा से टिकट मिलने की स्थिति में कीर्ति की उम्मीदवारी के पीछे धर्मेन्द्र का चुनावी अनुभव, पुराने कार्यकर्ताओं से संपर्क और व्यक्तिगत समर्थकों की ताकत होगी। भाजपा के लिए तब अपने परंपरागत मतदाताओं को बनाए रखने के साथ धर्मेन्द्र से जुड़े समर्थकों को साधना भी जरूरी हो जाएगा। यही समीकरण बिथरी की लड़ाई को उसके लिए टेढ़ी खीर बना सकता है।

कश्यप समर्थकों के साथ व्यक्तिगत जनाधार खिसकने की संभावना

धर्मेन्द्र के राजनीतिक कदम का असर केवल एक नेता के दल बदलने तक सीमित रहने की संभावना नहीं है। लंबे सार्वजनिक जीवन में उन्होंने पार्टी संगठन के अलावा अपना व्यक्तिगत समर्थक आधार भी बनाया है। इसमें कश्यप समाज के समर्थकों के साथ दूसरे वर्गों के उनसे जुड़े मतदाता और कार्यकर्ता भी शामिल हैं। इन समर्थकों का एक हिस्सा उनके साथ सपा की ओर जाता है तो भाजपा को दोहरी चुनौती मिल सकती है—अपने समर्थन में संभावित कमी रोकना और विपक्ष की बढ़ती ताकत का मुकाबला करना। हालांकि इस बदलाव का वास्तविक पैमाना चुनावी संगठन, उम्मीदवारों और स्थानीय मुद्दों पर निर्भर करेगा; पूरे समाज का वोट किसी एक दिशा में जाना तय नहीं माना जा सकता।

कई सीटों पर भाजपा को बढ़ानी पड़ सकती है मेहनत

धर्मेन्द्र दो बार आंवला से सांसद रह चुके हैं। उनके पुराने राजनीतिक संपर्क और समर्थकों का दायरा बिथरी से बाहर भी है। सपा यदि इस नेटवर्क को अपने संगठन से जोड़ने में सफल होती है तो भाजपा को आसपास की कई सीटों पर अधिक मेहनत करनी पड़ सकती है। भाजपा के सामने चुनौती होगी कि धर्मेन्द्र से जुड़े स्थानीय कार्यकर्ताओं और मतदाताओं का भरोसा कैसे बनाए रखा जाए। वहीं सपा के लिए अवसर होगा कि पूर्व सांसद की व्यक्तिगत पकड़ को बूथ स्तर की चुनावी ताकत में बदले। यह प्रक्रिया कितनी सफल होगी, इसी से तय होगा कि नई गोलबंदी का असर बिथरी तक रहता है या व्यापक रूप लेता है।

सपा के भीतर भी टिकट का समीकरण बदलेगा

कीर्ति को बिथरी से चुनाव लड़ाने की घोषणा ने सपा के पुराने दावेदारों के सामने भी नई स्थिति पैदा कर दी है। धर्मेन्द्र की वापसी के बाद पार्टी नेतृत्व को उनकी अपेक्षाओं और पहले से तैयारी कर रहे नेताओं की दावेदारी के बीच संतुलन बनाना होगा। कीर्ति को टिकट मिलता है तो सभी स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकजुट करना सपा की पहली परीक्षा होगी। मजबूत समर्थक आधार के साथ संगठन की एकजुटता जुड़ी तो भाजपा के लिए मुकाबला अधिक कठिन हो सकता है। धर्मेन्द्र ने अखिलेश से मुलाकात और बेटी की चुनावी दावेदारी के जरिए अपनी अगली राजनीतिक दिशा स्पष्ट कर दी है। अब उनकी औपचारिक ज्वाइनिंग और सपा का टिकट संबंधी फैसला बिथरी की लड़ाई का अगला मोड़ तय करेगा।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *