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कोटा। राजस्थान के हाड़ौती अंचल से दिल दहला देने वाली तस्वीर सामने आई है। कोटा की भामाशाह मंडी में बुधवार को किसान हंसराज वैष्णव अपनी ही गेहूं की बोरियों के ढेर पर मृत मिले। बेमौसम बारिश-ओलावृष्टि से फसल बर्बादी, सरकारी खरीद केंद्र से रिजेक्शन और मंडी में औने-पौने दाम—इन तीनों झटकों ने एक अन्नदाता की जिंदगी छीन ली।

कुदरत की मार, सिस्टम की बेरुखी

झाड़ आमली निवासी करीब 50 वर्षीय हंसराज वैष्णव की तीन बीघा गेहूं की फसल कुछ दिन पहले हुई ओलावृष्टि में बुरी तरह खराब हो गई थी। बची-खुची फसल लेकर वह सरकारी खरीद केंद्र पहुंचे, लेकिन ‘क्वालिटी खराब’ बताकर गेहूं लेने से इनकार कर दिया गया। यहीं से उनकी मुश्किलें और बढ़ गईं।

मंडी में मिला ‘जख्म’, जो जानलेवा बना

सरकारी केंद्र से लौटने के बाद हंसराज मंगलवार रात भामाशाह मंडी पहुंचे। पूरी रात उन्होंने जाम और लंबी लाइन में इंतजार किया। बुधवार सुबह नीलामी शुरू हुई तो उनकी फसल की बोली महज 2400 रुपये प्रति क्विंटल लगी—जो लागत से भी कम बताई जा रही है। परिजनों के मुताबिक हंसराज पर करीब 8 लाख रुपये का कर्ज था। फसल के कम दाम और कर्ज चुकाने की चिंता ने उन्हें अंदर से तोड़ दिया। नीलामी के बाद वह चुपचाप अपनी बोरियों के पास बैठे और फिर वहीं लेट गए।

बोरियां बनीं अंतिम बिस्तर

आसपास मौजूद लोगों ने पहले समझा कि किसान थकान से सो गया है, लेकिन काफी देर तक कोई हरकत नहीं होने पर स्थिति स्पष्ट हुई। मौके पर मौजूद व्यापारी आरसी झंवर के अनुसार, नीलामी के बाद हंसराज पूरी तरह गुमसुम हो गए थे। अनंतपुरा थाना पुलिस की शुरुआती जांच में मौत का कारण हार्ट अटैक माना जा रहा है। हंसराज के परिवार में अब उनका इकलौता बेटा रह गया है। पत्नी की पहले ही मौत हो चुकी थी। इस घटना के बाद मंडी में किसानों में भारी आक्रोश है। उनका कहना है कि अगर आपदा के समय सरकार राहत देकर फसल खरीद लेती, तो शायद आज एक किसान की जान बच सकती थी।

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