बरेली। रात होते ही शहर की सड़कों पर लंबी दूरी की निजी बसों का संचालन तेज हो जाता है। सेटेलाइट, श्यामगंज और आसपास के इलाकों से दिल्ली, जयपुर, पंजाब समेत दूसरे राज्यों के लिए बसें यात्रियों को भरकर रवाना हो रही हैं। इनमें दूसरे राज्यों में पंजीकृत बसें भी शामिल हैं। इसके उलट आरटीओ की जांच का जोर परमिट, फिटनेस और दूसरे दस्तावेजों पर अधिक दिखाई देता है। बसों की मौजूदा तकनीकी हालत, अतिरिक्त वायरिंग, मॉडिफिकेशन, इमरजेंसी एग्जिट और अग्निसुरक्षा की मौके पर गहन जांच की जरूरत बनी हुई है। ग्रेटर नोएडा में स्लीपर बस अग्निकांड में नौ यात्रियों की मौत के बाद यह लापरवाही और गंभीर हो जाती है।
शहर में कई स्थानों पर लंबी दूरी की निजी बसों के लिए यात्रियों की बुकिंग की जा रही है। रात में निर्धारित समय पर यात्री पहुंचते हैं और बसें उन्हें लेकर दूसरे शहरों और राज्यों के लिए निकल जाती हैं। इस पूरे संचालन में बस के परमिट की श्रेणी सबसे महत्वपूर्ण है। ऑल इंडिया टूरिस्ट परमिट, कांट्रेक्ट कैरिज और स्टेज कैरिज की संचालन शर्तें अलग-अलग हैं। ऐसे में काउंटर से रोजाना अलग-अलग यात्रियों की बुकिंग कर उन्हें लेकर चलने वाली बसों के परमिट की शर्तों और वास्तविक संचालन का मौके पर मिलान जरूरी है। यह जिम्मेदारी परिवहन विभाग की है।
दूसरे राज्यों के नंबर, बरेली से रोज भर रहीं सवारियां
लंबी दूरी की बसों में दूसरे राज्यों में पंजीकृत वाहन भी शामिल हैं। इन बसों के परमिट और फिटनेस ऑनलाइन रिकॉर्ड में वैध होने के बावजूद उनकी मौजूदा तकनीकी स्थिति अलग विषय है। फिटनेस के समय बस की बॉडी और सीटों की स्थिति क्या थी, उसके बाद कितना मॉडिफिकेशन हुआ और अतिरिक्त इलेक्ट्रिक उपकरण लगाने के लिए वायरिंग में क्या बदलाव किए गए, इसकी भौतिक जांच जरूरी है। बस भले ही दूसरे राज्य में पंजीकृत हो, लेकिन जब यात्री बरेली से उसमें सवार हो रहे हैं तो स्थानीय स्तर पर सुरक्षा जांच भी उतनी ही महत्वपूर्ण हो जाती है।
फिटनेस का कागज पास, सड़क पर बस की हालत भी देखना जरूरी
परिवहन विभाग की जांच केवल फिटनेस प्रमाणपत्र की वैधता देखने तक सीमित रहने से बस की वास्तविक तकनीकी खामियां सामने नहीं आ सकतीं। लंबी दूरी की कई बसों में अतिरिक्त लाइट, चार्जिंग प्वाइंट और दूसरे इलेक्ट्रिक उपकरण लगाए जाते हैं। इनके लिए अतिरिक्त वायरिंग की जाती है। बसों में बाद में कराए गए मॉडिफिकेशन, वायरिंग की स्थिति, टायर, ब्रेक और इमरजेंसी एग्जिट की कार्यशीलता सीधे यात्रियों की सुरक्षा से जुड़ी है। इनकी जांच सड़क पर बस को रोककर ही प्रभावी ढंग से की जा सकती है।
नौ मौतों के बाद भी विशेष तकनीकी जांच की दरकार
23 सितंबर को ग्रेटर नोएडा में यमुना एक्सप्रेसवे पर स्लीपर बस में आग लगने से नौ यात्रियों की मौत हो गई थी। हादसे ने लंबी दूरी की निजी बसों में आग से बचाव और सुरक्षित निकासी की व्यवस्था की गंभीरता सामने ला दी। घटना को पांच दिन बीत चुके हैं। इसके बाद बरेली में भी रात में संचालित होने वाली निजी बसों को खड़ा कर वायरिंग, मॉडिफिकेशन, इमरजेंसी एग्जिट, अग्निशमन उपकरण, टायर और ब्रेक की विशेष तकनीकी जांच की जरूरत बढ़ गई है। हादसे के बाद कितनी बसों की ऐसी जांच हुई, कितनी में तकनीकी खामियां मिलीं और गंभीर कमियों पर कितनी कार्रवाई हुई, इसका स्पष्ट ब्योरा सामने आना भी जरूरी है।
55-60 यात्रियों की जिंदगी, सिलिंडर टांग देने से पूरी नहीं होती सुरक्षा
लंबी दूरी की एक बस में 55 से 60 यात्री तक सफर करते हैं। आग लगने की स्थिति में कुछ मिनट की देरी भी बड़ी दुर्घटना का कारण बन सकती है। ऐसे में बस में अग्निशमन सिलिंडर लगा होना ही पर्याप्त नहीं है। सिलिंडर चालू हालत में है या नहीं, उसकी वैधता कब तक है, चालक-परिचालक उसका इस्तेमाल जानते हैं या नहीं और आपात स्थिति में इमरजेंसी गेट तत्काल खुल सकता है या नहीं, इन सभी बिंदुओं की मौके पर जांच जरूरी है। यात्रियों की सुरक्षा सिर्फ फिटनेस प्रमाणपत्र के नंबर के भरोसे नहीं छोड़ी जा सकती।
बसें रात में दौड़ती हैं तो जांच भी रात में उतारनी होगी सड़क पर
लंबी दूरी की निजी बसों का मुख्य संचालन रात में होता है। इसलिए आरटीओ की प्रभावी जांच भी उन्हीं घंटों में बसों के बुकिंग और संचालन वाले स्थानों पर जरूरी है। बस को मौके पर रोककर परमिट की श्रेणी का वास्तविक संचालन से मिलान करने के साथ टायर, ब्रेक, वायरिंग, मॉडिफिकेशन, अग्निशमन उपकरण और इमरजेंसी एग्जिट की पड़ताल होनी चाहिए। कागजों में परमिट और फिटनेस सही मिलना जांच का एक हिस्सा है, लेकिन यात्रियों की सुरक्षा की असली तस्वीर बस की भौतिक जांच से ही सामने आएगी।
आरटीओ बोले, नियमित होती है चेकिंग
आरटीओ प्रणव झा का कहना है कि बसों की नियमित चेकिंग की जाती है और कमियां मिलने पर जुर्माना लगाया जाता है। विभाग के इस दावे के बीच ग्रेटर नोएडा की घटना ने जांच का दायरा तकनीकी सुरक्षा तक बढ़ाने की जरूरत और बढ़ा दी है। रात में यात्रियों को भरकर सैकड़ों किलोमीटर के सफर पर निकलने वाली बसों की जांच सिर्फ परमिट और फिटनेस के कागजों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। वायरिंग, मॉडिफिकेशन, ब्रेक, टायर, इमरजेंसी गेट और अग्निसुरक्षा की मौके पर सख्त जांच से ही खामियां हादसे से पहले पकड़ी जा सकती हैं। ग्रेटर नोएडा का हादसा चेतावनी दे चुका है, अब बरेली में आरटीओ की निगरानी का असर कागजों से निकलकर सड़क पर दिखना जरूरी है।