sडिजिटल विरासत बनेगी पंडित राधेश्याम कथावाचक की साहित्यिक धरोहर, प्रो. अनीता त्यागी।

बरेली। कभी जिन पन्नों पर स्याही से विचार और किरदार आकार लेते थे, अब वही पन्ने डिजिटल स्क्रीन पर नई पीढ़ी से संवाद करेंगे। महात्मा ज्योतिबा फुले रुहेलखंड विश्वविद्यालय ने महान नाटककार पंडित राधेश्याम कथावाचक की मूल पांडुलिपियों और निजी दस्तावेजों को डिजिटल विरासत में बदलने की तैयारी शुरू कर दी है। फिलहाल उनकी छह हस्तलिखित डायरियों को स्कैन किया जा रहा है।

समय की मार से बचेंगी अनमोल पांडुलिपियां

विश्वविद्यालय स्थित पंडित राधेश्याम कथावाचक शोधपीठ ने साहित्य और रंगमंच की इस अनमोल धरोहर की डिजिटल आर्काइव तैयार करने का काम शुरू किया है। इसका उद्देश्य वर्षों पुराने दस्तावेजों को सुरक्षित रखने के साथ ही उन्हें शोधार्थियों के लिए आसानी से उपलब्ध कराना है।

छह डायरियों से शुरू हुआ डिजिटल सफर

शोधपीठ को फिलहाल पंडित राधेश्याम कथावाचक की छह मूल डायरियां मिली हैं। प्रत्येक पन्ने को सावधानी से स्कैन कर डिजिटल स्वरूप दिया जा रहा है। भविष्य में उनकी अन्य पांडुलिपियां और हस्तलिखित दस्तावेज मिलने पर उन्हें भी इस डिजिटल संग्रह में शामिल किया जाएगा।

डायरियां बताएंगी मंच के पीछे का जीवन

शोधपीठ की समन्वयक एवं मानविकी विभागाध्यक्ष प्रो. अनीता त्यागी के मुताबिक, ये डायरियां पंडित राधेश्याम के सार्वजनिक व्यक्तित्व के पीछे छिपे निजी जीवन, विचारों और रचनात्मक संघर्षों को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। डिजिटल आर्काइव बनने से मूल दस्तावेज सुरक्षित रहेंगे और शोधकर्ताओं को दुर्लभ सामग्री तक आसानी से पहुंच मिल सकेगी।

राधेश्याम रामायण ने घर-घर पहुंचाई रामकथा

पारसी थिएटर के पुरोधा पंडित राधेश्याम कथावाचक की गिनती हिंदी के प्रमुख नाटककारों में होती है। उनकी चर्चित रचनाओं में वीर अभिमन्यु, परिवर्तन, श्रवण कुमार, ईश्वर-भक्ति, ऊषा-अनिरुद्ध और कृष्ण-सुदामा शामिल हैं। उनकी लिखी राधेश्याम रामायण को महान कृतियों में शुमार किया जाता है। उन्होंने रामकथा को ऐसी सहज भाषा और शैली में प्रस्तुत किया, जो आम श्रोताओं के बीच बेहद लोकप्रिय हुई।

देशभर के शोधार्थियों के लिए खुलेंगे दरवाजे

रुहेलखंड विश्वविद्यालय में प्री-पीएचडी कोर्स वर्क के दौरान शोधार्थियों को पंडित राधेश्याम के साहित्य, नाटकों और रचनात्मक योगदान पर शोध के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है। विश्वविद्यालय के साथ ही दूसरे शहरों और शैक्षणिक संस्थानों से आने वाले शोधार्थी भी डायरियों, पांडुलिपियों और उपलब्ध साहित्यिक सामग्री का अध्ययन कर सकेंगे।

पंडित राधेश्याम कथावाचक की मूल पांडुलिपियों को स्कैन कर डिजिटल आर्काइव बनाई जा रही है। इससे देशभर के शोधार्थियों को मूल दस्तावेजों तक पहुंचने और उनका अकादमिक लाभ लेने में आसानी होगी।
प्रो. अनीता त्यागी, समन्वयक, पंडित राधेश्याम कथावाचक शोधपीठ

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