बरेली। मिशन-2027 से पहले घोषित भाजपा की ब्रज क्षेत्र की टीम संतुलन से ज्यादा चयन के पैमाने को लेकर चर्चाओं में है। वर्षों तक बूथों पर पार्टी का झंडा उठाने और दरी बिछाने वाले कई पुराने कार्यकर्ता हाशिये पर हैं। जबकि हाल में सक्रिय हुये पैराशूट से आये कुछ चेहरों को संगठन में तेजी से कृपा पात्र होने के वजह से आगे बढ़ाया जा रहा है। पीलीभीत में पूर्व में निष्कासित किए गए नेता की क्षेत्रीय टीम में वापसी और आगरा से नौ लोगों के चयन ने असंतोष को और हवा दे दी है।
बरेली में सबसे ज्यादा चर्चा डेंटिस्ट आदेश गंगवार की है। करीब दो वर्ष पहले ही भाजपा में सक्रिय हुये हैं। पहले उन्हें महानगर भाजपा की टीम में महामंत्री बनाया गया और अब सीधे ब्रज क्षेत्रीय टीम में मंत्री की जिम्मेदारी दे दी गई। पार्टी के भीतर उन्हें एक प्रभावशाली जनप्रतिनिधि का करीबी बताया जा रहा है। इसी निकटता को उनकी तेज राजनीतिक पदोन्नति से जोड़कर देखा जा रहा है। संगठन के नियमानुसार उनके पास एक समय में एक ही पद रहेगा। ऐसे में उन्हें महानगर महामंत्री का पद छोड़ना होगा। इसके बाद महानगर भाजपा को नया महामंत्री तलाशना पड़ेगा। इसे लेकर संगठन में अंदरखाने विरोध और शिकायतों का दौर शुरू हो गया है।
पीलीभीत भाजपा में निष्कासन, क्षेत्रीय नेतृत्व ने बना दिया पदाधिकारी
ब्रज टीम को लेकर सबसे गंभीर सवाल पीलीभीत से उठ रहा है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक किसान आंदोलन के दौरान पार्टी विरोधी गतिविधियों और अनुशासनहीनता के आरोप में सतनाम सिंह को तत्कालीन जिलाध्यक्ष संजीव प्रताप सिंह ने संगठन से निष्कासित किया था, उसे अब क्षेत्रीय टीम में मंत्री की जिम्मेदारी दे दी गई है। लंबे समय तक जिला संगठन का नेतृत्व करने वाले पूर्व जिलाध्यक्ष संजीव प्रताप सिंह, बरेली से पवन शर्मा, आंवला से वीर सिंह पाल को क्षेत्रीय कार्यसमिति में केवल सदस्य पद से संतोष करना पड़ा। इससे सवाल उठ रहा है कि क्या जिला इकाई की अनुशासनात्मक कार्रवाई को क्षेत्रीय स्तर पर नजरअंदाज कर दिया गया या संबंधित नेता की वापसी के पीछे कोई नया राजनीतिक समीकरण काम कर रहा है।
सुग्रीव की ताजपोशी पर सोशल मीडिया में सवाल
आगरा के पूर्व ब्लॉक प्रमुख सुग्रीव सिंह चौहान को क्षेत्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने पर भी सोशल मीडिया में तरह-तरह की चर्चाएं चल रही हैं। उनके पुराने विवादों और कथित मामलों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन दावों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन चयन को लेकर संगठन के भीतर असहजता जरूर दिखाई दे रही है। आगरा के पूर्व जिलाध्यक्ष श्याम सिंह भदौरिया को क्षेत्रीय टीम में स्थान नहीं मिलने की चर्चा है। पुराने और अनुभवी नेताओं की अनदेखी तथा नए समीकरणों के आधार पर जिम्मेदारियां बांटे जाने के आरोपों ने चयन प्रक्रिया को सवालों के घेरे में ला दिया है।
30-40 साल झंडा उठाने वाले पीछे, पैराशूट चेहरों की लंबी छलांग
क्षेत्रीय टीम की घोषणा के बाद पार्टी के पुराने कार्यकर्ताओं में सबसे बड़ी नाराजगी सम्मान और वरिष्ठता को लेकर बताई जा रही है। दशकों से पार्टी के कार्यक्रमों में दरी बिछाने, बूथ संभालने, मतदाता सूची दुरुस्त कराने और घर-घर भाजपा का झंडा पहुंचाने वाले कार्यकर्ताओं का आरोप है कि समर्पण और संघर्ष अब चयन का मुख्य आधार नहीं रह गया है। कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को या तो टीम में जगह नहीं मिली अथवा कार्यसमिति सदस्य बनाकर सबसे पिछले पायदान पर डाल दिया गया। इसके विपरीत हाल में सक्रिय हुए और प्रभावशाली नेताओं के नजदीकी माने जाने वाले चेहरों को महत्वपूर्ण पद मिलने से संगठन के भीतर परिश्रम पर पैरवी भारी होने की चर्चा तेज है।
37 पदों में आगरा-बरेली का दबदबा
भाजपा ब्रज क्षेत्र के अध्यक्ष पूरन लाल लोधी की घोषित टीम में 10 उपाध्यक्ष, चार महामंत्री, 10 मंत्री और 13 कार्यसमिति सदस्य हैं। इस तरह क्षेत्रीय अध्यक्ष को छोड़कर कुल 37 नेताओं को जिम्मेदारी मिली है। इनमें आगरा जनपद से सर्वाधिक नौ और बरेली से आठ नेताओं को स्थान दिया गया है। बरेली की डॉ. निवेदिता श्रीवास्तव को उपाध्यक्ष, संजीव शर्मा एडवोकेट को महामंत्री तथा डॉ. आदेश गंगवार और दीपक सोनकर को क्षेत्रीय मंत्री बनाया गया है। पवन शर्मा, यतिन भाटिया, वीर सिंह पाल और चंचल गंगवार को कार्यसमिति सदस्य बनाया गया है। आगरा और बरेली के 17 चेहरों को स्थान मिलने के बाद शेष जिलों के प्रतिनिधित्व को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। संगठनात्मक दृष्टि से ब्रज क्षेत्र में 19 जिले आते हैं, जबकि प्रशासनिक रूप से यह क्षेत्र 12 जनपदों में फैला है। इसके अंतर्गत 13 लोकसभा और 65 विधानसभा क्षेत्र आते हैं।
ब्राह्मण प्रभाव वाले तीन जिलों से एक भी ब्राह्मण नहीं
टीम के सामाजिक संतुलन पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। पार्टी के अंदर चर्चा है कि ब्राह्मण मतदाताओं के प्रभाव वाले पीलीभीत, शाहजहांपुर और बदायूं से किसी ब्राह्मण चेहरे को क्षेत्रीय टीम में स्थान नहीं मिला। यह स्थिति तब है, जब यूजीसी नियमों और आरक्षण से जुड़े आंदोलनों को लेकर सवर्ण समाज के एक हिस्से में पहले से नाराजगी दिखाई दे रही है। भाजपा के लिए ब्राह्मण मतदाता लंबे समय से मजबूत आधार माने जाते रहे हैं। ऐसे में प्रभाव वाले जिलों से इस समाज का प्रतिनिधित्व न होना मिशन-2027 की रणनीति पर सवाल खड़ा कर रहा है। हालांकि, भाजपा नेतृत्व का दावा है कि टीम बनाते समय जातीय, सामाजिक, राजनीतिक और भौगोलिक संतुलन साधा गया है।
यूजीसी और आरक्षण की चिंगारी के बीच चयन पर घिरी भाजपा
यूजीसी नियमों और आरक्षण से जुड़े सवालों पर सवर्ण संगठनों का आंदोलन भाजपा के लिए पहले ही चुनौती बना हुआ है। उत्तर प्रदेश में हुए प्रदर्शनों और पार्टी कार्यकर्ताओं की नाराजगी ने नेतृत्व को असहज किया है। ऐसे समय में क्षेत्रीय संगठन से अपेक्षा थी कि वह सभी प्रमुख सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर चुनाव से पहले असंतोष कम करेगा। इसके उलट नई टीम में क्षेत्रीय और सामाजिक असंतुलन के आरोप लगने लगे हैं। पार्टी के विधायकों और जनप्रतिनिधियों का एक वर्ग भी इस बात को लेकर चिंतित बताया जा रहा है कि जिन पदाधिकारियों को चुनावी मैदान में संगठन संभालना है, वे अपने समाज और क्षेत्र में कितना प्रभाव रखते हैं।