हेल्थ डेस्क। गर्मी के मौसम में तेज धूप से त्वचा का झुलसना या टैन होना आम बात है, लेकिन कुछ लोगों के लिए धूप गंभीर परेशानी का कारण बन सकती है। धूप में निकलते ही अगर त्वचा पर खुजली, लाल चकत्ते, जलन या सूजन होने लगे तो यह सन एलर्जी का संकेत हो सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार यह सिर्फ सामान्य एलर्जी नहीं, बल्कि सूर्य की पराबैंगनी (यूवी) किरणों के प्रति शरीर के इम्यून सिस्टम की असामान्य प्रतिक्रिया होती है।
धूप के संपर्क में आते ही शुरू हो सकते हैं लक्षण
त्वचा रोग विशेषज्ञों के मुताबिक सन एलर्जी के कारण शरीर के खुले हिस्सों जैसे चेहरा, गर्दन, हाथ और बाजुओं पर लाल दाने, खुजली, जलन और सूजन दिखाई देने लगती है। कुछ मामलों में छोटे-छोटे छाले भी बन जाते हैं। गंभीर स्थिति में धूप में जाने के कुछ मिनट बाद ही त्वचा पर पित्ती जैसे उभरे हुए निशान पड़ सकते हैं।
सन एलर्जी के कई प्रकार
विशेषज्ञ बताते हैं कि सन एलर्जी का सबसे सामान्य रूप पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन (PMLE) है, जिसमें धूप के बाद खुजली वाले लाल दाने निकल आते हैं। इसके अलावा एक्टिनिक प्रुरिगो, फोटोएलर्जिक रिएक्शन और सोलर अर्टिकेरिया जैसी स्थितियां भी होती हैं। कई बार सनस्क्रीन, परफ्यूम या स्किनकेयर उत्पादों में मौजूद रसायन भी धूप के साथ प्रतिक्रिया कर एलर्जी पैदा कर सकते हैं।
कुछ दवाएं भी बढ़ा सकती हैं खतरा
कुछ एंटीबायोटिक्स, दर्द निवारक दवाएं और मुंहासों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाएं त्वचा को धूप के प्रति अधिक संवेदनशील बना सकती हैं। इसके अलावा ल्यूपस, रोसैसिया और मुंहासों जैसी त्वचा संबंधी बीमारियां भी धूप के कारण अधिक गंभीर हो सकती हैं।
इन लोगों में ज्यादा रहता है जोखिम
हल्के रंग की त्वचा वाले लोगों, परिवार में सन एलर्जी का इतिहास रखने वालों और कुछ विशेष दवाएं लेने वाले लोगों में यह समस्या अधिक देखी जाती है। महिलाओं, खासकर 20 से 30 वर्ष आयु वर्ग में, पॉलीमॉर्फस लाइट इरप्शन के मामले ज्यादा सामने आते हैं।
लक्षण दिखें तो डॉक्टर से करें संपर्क
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि धूप में निकलने के बाद बार-बार त्वचा पर रैशेज, खुजली या सूजन की समस्या हो रही है तो इसे नजरअंदाज न करें। त्वचा रोग विशेषज्ञ से सलाह लेकर उचित उपचार, सनस्क्रीन का इस्तेमाल, शरीर को ढकने वाले कपड़े पहनना और आवश्यक होने पर दवाओं में बदलाव कर इस समस्या को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है। सन एलर्जी का समय पर इलाज न होने पर यह रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।