Social Sharing icon

नई दिल्ली। देशभर में चोरी की लग्जरी कारों को “नई पहचान” देकर बेचने वाले एक बड़े और बेहद शातिर हाई-टेक सिंडिकेट का दिल्ली क्राइम ब्रांच ने पर्दाफाश किया है। इस गिरोह का नेटवर्क इतना मजबूत था कि चोरी या लोन डिफॉल्ट गाड़ियों को पूरी तरह नया रूप देकर वैध बना दिया जाता था। पुलिस ने इस मामले में मास्टरमाइंड समेत 10 आरोपियों को गिरफ्तार किया है और उनके कब्जे से 31 हाई-एंड लग्जरी गाड़ियां बरामद की हैं। शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह गैंग अब तक 1000 से ज्यादा गाड़ियां देशभर में बेच चुका है, जिससे करोड़ों रुपये का खेल किया गया।

चोरी से रजिस्ट्रेशन तक… पूरा सिस्टम था सेट

डीसीपी (क्राइम) आदित्य गौतम के मुताबिक, इस सिंडिकेट का खुलासा अगस्त 2025 में पीतमपुरा इलाके से चोरी हुई एक हुंडई क्रेटा की जांच के दौरान हुआ। पुलिस ने जब गाड़ी की पड़ताल शुरू की तो एक चौंकाने वाला नेटवर्क सामने आया। एसीपी रमेश लांबा की निगरानी में इंस्पेक्टर मनमीत मलिक की टीम ने पाया कि गिरोह सबसे पहले चोरी की गई या लोन डिफॉल्ट गाड़ियां खरीदता था। इसके बाद एक्सपर्ट मैकेनिक की मदद से गाड़ियों के चेसिस नंबर और इंजन नंबर को बदल दिया जाता था। इसके बाद शुरू होता था फर्जीवाड़े का असली खेल—नकली फॉर्म-21, फर्जी बैंक एनओसी और अन्य दस्तावेज तैयार किए जाते थे, जिससे गाड़ी पूरी तरह “लीगल” नजर आए।

‘वाहन’ पोर्टल तक पहुंच, सिस्टम के अंदर से खेल

जांच में यह भी सामने आया कि इस पूरे खेल में ट्रांसपोर्ट विभाग के कुछ कर्मचारी और एजेंट भी शामिल थे। ये लोग सरकारी सिस्टम में सेंध लगाकर ‘वाहन’ पोर्टल पर गाड़ियों को वैध दिखाते थे और उनका दोबारा रजिस्ट्रेशन करा देते थे। यही वजह थी कि खरीदारों को जरा भी शक नहीं होता था। उन्हें गाड़ी के पूरे दस्तावेज सही मिलते थे और वे उसे असली समझकर खरीद लेते थे। पुलिस के मुताबिक, यह नेटवर्क इतने संगठित तरीके से काम करता था कि हर कड़ी एक-दूसरे से जुड़ी हुई थी—चोरी से लेकर बिक्री तक सब कुछ प्लानिंग के तहत होता था।

मास्टरमाइंड ‘लकी’ का पूरा नेटवर्क

इस गिरोह का सरगना दमनदीप सिंह उर्फ लकी (42) बताया जा रहा है, जो जालंधर में सेकंड हैंड कारों का कारोबार करता था। वही इस पूरे नेटवर्क का दिमाग था। लकी ही चोरी की गाड़ियों की खरीद से लेकर चेसिस नंबर बदलने, फर्जी कागजात तैयार कराने, दोबारा रजिस्ट्रेशन और अंत में बिक्री तक पूरे ऑपरेशन को कंट्रोल करता था। इस गैंग में सॉफ्टवेयर इंजीनियर से एजेंट बने लोग, ट्रांसपोर्ट विभाग का क्लर्क, कार डीलर, मैकेनिक और बिचौलिए शामिल थे। हर किसी की जिम्मेदारी तय थी और उसी हिसाब से काम होता था।

करोड़ों का खेल, देशभर में फैला नेटवर्क

पुलिस की शुरुआती जांच में सामने आया है कि यह गिरोह पिछले कई सालों से सक्रिय था और अब तक 1000 से ज्यादा गाड़ियां बेच चुका है। इन गाड़ियों को अलग-अलग राज्यों में खपाया गया, जिससे आम लोगों, बैंकों और फाइनेंस कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। कई मामलों में लोग पूरी रकम देकर गाड़ी खरीदते थे, लेकिन बाद में वह चोरी की निकलती थी। पुलिस का मानना है कि इस रैकेट का टर्नओवर करोड़ों रुपये में है और अभी इसकी पूरी परतें खुलनी बाकी हैं।

छापेमारी जारी, और बड़े खुलासे संभव

क्राइम ब्रांच की टीम फिलहाल गिरफ्तार आरोपियों से पूछताछ कर रही है। उनके जरिए इस नेटवर्क से जुड़े अन्य लोगों की पहचान की जा रही है। पुलिस ने साफ किया है कि आने वाले दिनों में और गिरफ्तारियां हो सकती हैं। साथ ही ट्रांसपोर्ट विभाग में शामिल संदिग्ध कर्मचारियों की भूमिका की भी जांच की जा रही है। अधिकारियों के मुताबिक, यह मामला सिर्फ कार चोरी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिस्टम में सेंध लगाकर बड़े पैमाने पर धोखाधड़ी करने का मामला है।

खरीदारों के लिए चेतावनी: सस्ती गाड़ी का लालच पड़ सकता है भारी

इस पूरे मामले के बाद पुलिस ने आम लोगों को भी सतर्क रहने की सलाह दी है। सस्ती कीमत में लग्जरी कार खरीदने का लालच कई बार भारी पड़ सकता है। गाड़ी खरीदने से पहले उसके दस्तावेज, चेसिस नंबर और रजिस्ट्रेशन की पूरी जांच करना जरूरी है। शक होने पर तुरंत संबंधित विभाग या पुलिस से संपर्क करना चाहिए।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *