भारत की वायु शक्ति को नई ऊंचाई देने की दौड़ तेज होती जा रही है। एक तरफ स्वदेशी AMCA प्रोजेक्ट पर काम जारी है, तो दूसरी ओर रूस ने भारत को अपनी सबसे एडवांस पांचवीं पीढ़ी की स्टील्थ फाइटर तकनीक देने का बड़ा प्रस्ताव रखा है। मॉस्को ने भारत के सामने Su-57 स्टील्थ फाइटर जेट का ऑफर रखते हुए टेक्नोलॉजी ट्रांसफर (ToT) तक देने की बात कही है। यह प्रस्ताव ऐसे समय आया है जब भारतीय वायु सेना को आधुनिक स्टील्थ लड़ाकू विमानों की जरूरत तेजी से महसूस हो रही है।
भारत के सामने रूस का बड़ा रक्षा प्रस्ताव
भारत और रूस के बीच दशकों पुरानी रक्षा साझेदारी अब एक नए मोड़ पर पहुंचती दिखाई दे रही है। रूस ने भारत को अपने अत्याधुनिक पांचवीं पीढ़ी के Su-57 स्टील्थ फाइटर जेट का ऑफर दिया है। यह प्रस्ताव जनवरी 2026 में आयोजित विंग्स इंडिया प्रदर्शनी के दौरान सामने आया। रिपोर्टों के अनुसार रूस न केवल यह विमान भारत को उपलब्ध कराने को तैयार है, बल्कि इसकी पूरी टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करने की पेशकश भी कर रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रस्ताव स्वीकार होता है तो भारत की वायु शक्ति को नई ताकत मिल सकती है। साथ ही इससे भारत और रूस के बीच रक्षा सहयोग का नया अध्याय भी शुरू हो सकता है।
दो सीटों वाला अत्याधुनिक स्टील्थ फाइटर
रूस द्वारा प्रस्तावित Su-57E स्टील्थ फाइटर जेट अपने डिजाइन और क्षमताओं के कारण दुनिया के सबसे उन्नत लड़ाकू विमानों में गिना जाता है। यह दो इंजन और दो सीटों वाला विमान है, जिसे जटिल युद्ध अभियानों के लिए डिजाइन किया गया है। इसकी अधिकतम गति मैक-2 यानी लगभग 2,135 से 2,600 किलोमीटर प्रति घंटे तक बताई जाती है। यह मल्टी-रोल फाइटर जेट है, जो एयर-टू-एयर और एयर-टू-ग्राउंड मिशनों को अंजाम देने में सक्षम है। इसके अलावा यह यूएवी यानी ड्रोन को नियंत्रित करने की क्षमता भी रखता है। Su-57 में पांच AESA रडार लगाए गए हैं और यह लगभग 10,000 किलोग्राम तक हथियार ले जाने में सक्षम है। इसमें अत्याधुनिक ऑप्टिकल सेंसर और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित कॉम्बैट ऑटोमेशन सिस्टम भी मौजूद है।
टेक्नोलॉजी ट्रांसफर का बड़ा प्रस्ताव
रूस का सबसे बड़ा प्रस्ताव यह है कि वह Su-57 के साथ इसकी तकनीक भी भारत को देने के लिए तैयार है। टेक्नोलॉजी ट्रांसफर यानी ToT के तहत भारत को इस विमान के डिजाइन, उत्पादन और सॉफ्टवेयर से जुड़ी अहम तकनीकों तक पहुंच मिल सकती है। यदि भारत को इसका सोर्स कोड उपलब्ध कराया जाता है, तो भारतीय वैज्ञानिक इसमें स्वदेशी हथियार प्रणालियां भी जोड़ सकते हैं। उदाहरण के तौर पर ब्रह्मोस और अस्त्र जैसी मिसाइलों को इस फाइटर जेट में फिट किया जा सकता है। इससे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता को भी बढ़ावा मिलेगा और भविष्य में स्वदेशी लड़ाकू विमानों के विकास में भी मदद मिल सकती है।
FGFA प्रोजेक्ट को फिर से जिंदा करने की कोशिश
दरअसल भारत और रूस के बीच पहले भी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान को लेकर साझेदारी की योजना बन चुकी है। इसे FGFA यानी फिफ्थ जेनरेशन फाइटर एयरक्राफ्ट प्रोजेक्ट कहा गया था। लेकिन 2018 में भारत इस परियोजना से बाहर हो गया था। उस समय विमान की कीमत, तकनीकी साझेदारी और स्टील्थ क्षमताओं को लेकर कई सवाल उठे थे। भारत का मानना था कि परियोजना में भारतीय इंजीनियरों को पर्याप्त भूमिका नहीं दी जा रही है। अब रूस नए प्रस्ताव के जरिए इसी परियोजना को दोबारा शुरू करने की कोशिश कर रहा है। विशेषज्ञों के अनुसार रूस का यह प्रस्ताव भारत के साथ रक्षा सहयोग को फिर से मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है।
AMCA आने में अभी लंबा समय
भारत फिलहाल अपने स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी के लड़ाकू विमान प्रोजेक्ट AMCA (Advanced Medium Combat Aircraft) पर काम कर रहा है। यह परियोजना भारतीय वायु सेना की भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए शुरू की गई है। हालांकि इसके प्रोटोटाइप के 2029 तक तैयार होने की संभावना है और बड़े पैमाने पर उत्पादन शुरू होने में 2035 तक का समय लग सकता है। ऐसे में भारतीय वायु सेना के सामने एक अंतरिम चुनौती बनी हुई है, क्योंकि वर्तमान में उसके पास पांचवीं पीढ़ी का कोई स्टील्थ लड़ाकू विमान नहीं है। रूस का Su-57 प्रस्ताव इसी कमी को पूरा करने का एक संभावित विकल्प माना जा रहा है।
मॉडर्न वॉरफेयर में दो सीटों का फायदा
रूस का दावा है कि दो सीटों वाला Su-57 आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से ज्यादा प्रभावी हो सकता है। अमेरिकी स्टील्थ फाइटर जेट F-22 और F-35 जैसे विमान सिंगल सीट वाले हैं, जबकि Su-57 में दो पायलट होते हैं। इसमें सामने वाला पायलट विमान उड़ाने और युद्ध संचालन पर ध्यान देता है, जबकि पीछे बैठा पायलट मिशन कमांडर की भूमिका निभा सकता है। वह ड्रोन नियंत्रण, सेंसर मॉनिटरिंग और रणनीतिक निर्णय लेने जैसे कार्य संभाल सकता है। इसे मैनड-अनमैनड टीमिंग यानी इंसान और मशीन की संयुक्त लड़ाई की अवधारणा के लिए बेहद उपयोगी माना जा रहा है। रिपोर्टों के अनुसार यदि भारत इस प्रस्ताव को स्वीकार करता है, तो 2026 के अंत या 2027 की शुरुआत तक इसका प्रोटोटाइप तैयार किया जा सकता है।