बुलंदशहर। भीड़भाड़ वाले रेलवे स्टेशन पर एक कोने में बैठी कांपती बूढ़ी मां की आंखें हर गुजरते चेहरे में अपने बेटे को तलाश रही थीं। उम्र करीब 80 साल, हाथों में कपड़ों का छोटा सा थैला और पास में पानी की बोतल। दो दिन पहले बेटा यही कहकर गया था—“मां यहीं बैठना, मैं अभी पैसे लेकर आता हूं।” मगर वह लौटकर कभी नहीं आया। यह दिल दहला देने वाली घटना बुलंदशहर के वैर रेलवे स्टेशन की है, जहां 48 घंटे तक मां अपने बेटे के इंतजार में बैठी रही।
स्टेशन के कोने में बैठी रही 80 साल की मां
बुलंदशहर के वैर रेलवे स्टेशन पर यात्रियों की भीड़ आती-जाती रही, लेकिन एक बुजुर्ग महिला पिछले दो दिनों से वहीं एक जगह बैठी रही। उसके चेहरे पर थकान, आंखों में इंतजार और शरीर में कमजोरी साफ दिखाई दे रही थी। आसपास के लोग उसे देखकर आगे बढ़ जाते, लेकिन वह हर गुजरते चेहरे को गौर से देखती—शायद उसका बेटा वापस आ जाए। उसके पास एक छोटा सा थैला था, जिसमें कुछ कपड़े रखे थे और एक पानी की बोतल थी। उम्र और बीमारी के कारण वह ठीक से चल भी नहीं पा रही थी। बावजूद इसके वह स्टेशन से हिली नहीं, क्योंकि उसे भरोसा था कि उसका बेटा उसे लेने जरूर आएगा।
दो दिन बाद RPF की नजर पड़ी तो खुली सच्चाई
सोमवार को रेलवे सुरक्षा बल के कांस्टेबल नवनीत कुमार और रामेंद्र सिंह की नजर उस बुजुर्ग महिला पर पड़ी। उन्होंने देखा कि महिला बेहद कमजोर और बीमार लग रही है। जब उनसे बात करने की कोशिश की गई तो वह अपना नाम और पता ठीक से नहीं बता पा रही थीं। दोनों जवानों ने स्टेशन के कर्मचारियों से पूछताछ की तो पता चला कि महिला पिछले दो दिनों से यहीं बैठी हुई है। यह सुनकर दोनों को शक हुआ कि मामला गंभीर है। उन्होंने तुरंत अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सूचना दी और महिला को अपने साथ खुर्जा ले गए। वहां पहले उन्हें खाना खिलाया गया और आराम दिया गया। इसके बाद धीरे-धीरे महिला ने जो कहानी बताई, उसने सबको भावुक कर दिया।
“मां यहीं बैठना… मैं पैसे लेकर आता हूं”
महिला ने कांपती आवाज में बताया कि उनका नाम रूपवती है और वह बदायूं जिले के बरौली सराय इलाके की रहने वाली हैं। वह अपने बेटे के साथ 7 मार्च को वैर रेलवे स्टेशन आई थीं। बेटे ने उन्हें स्टेशन पर बैठाकर कहा कि वह थोड़ी देर में पैसे लेकर वापस आ रहा है। बूढ़ी मां ने बेटे की बात पर भरोसा किया और वहीं बैठकर उसका इंतजार करने लगी। घंटों बीत गए, फिर रात हो गई और अगला दिन भी गुजर गया। लेकिन बेटा वापस नहीं आया। मां को उम्मीद थी कि शायद किसी कारण से देर हो गई होगी, इसलिए वह स्टेशन से कहीं नहीं गई। इस उम्मीद में कि बेटा लौटेगा, वह 48 घंटे तक वहीं बैठी रही।
बेटे ने जिम्मेदारी से मुंह मोड़ा, प्रशासन ने बढ़ाया हाथ
जब पूरी कहानी सामने आई तो आरपीएफ थाना प्रभारी नंद लाल मीणा समझ गए कि यह बुजुर्ग महिला अपने ही बेटे द्वारा लावारिस छोड़ दी गई है। उन्होंने तुरंत इस मामले की जानकारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों को दी और स्थानीय प्रशासन से संपर्क किया। प्रशासन ने फैसला लिया कि फिलहाल महिला को सुरक्षित स्थान पर रखा जाए। इसके बाद रूपवती को बुलंदशहर के जहांगीराबाद स्थित वृद्धा आश्रम भेज दिया गया, ताकि उनकी देखभाल ठीक से हो सके। पुलिस और प्रशासन ने यह भी कोशिश शुरू कर दी है कि महिला के परिवार के बारे में अधिक जानकारी जुटाई जा सके और यदि संभव हो तो उन्हें उनके घर तक पहुंचाया जाए।
समाज के लिए एक कड़वा आईना
जहांगीराबाद वृद्धा आश्रम के अधिकारी आकाश श्रीवास्तव ने बताया कि फिलहाल रूपवती की पूरी देखभाल की जा रही है। उन्हें भोजन, दवाइयां और रहने की व्यवस्था दी गई है। साथ ही प्रशासन और सामाजिक संस्थाएं मिलकर यह प्रयास कर रही हैं कि महिला को उनके परिवार तक पहुंचाया जा सके। हालांकि इस घटना ने समाज के सामने एक कड़वा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या आज के दौर में माता-पिता का सम्मान और जिम्मेदारी इतनी कमजोर हो गई है कि एक बेटा अपनी 80 साल की मां को स्टेशन पर छोड़कर चला जाए? यह घटना सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली सच्चाई भी है। जिस मां ने बेटे को बचपन में संभाला, उसी मां को जिंदगी के आखिरी पड़ाव पर अकेला छोड़ देना मानवता के लिए सबसे बड़ा सवाल बन गया है।