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महासमुंद/छत्तीसगढ़। कुछ कहानियां सिर्फ सफलता की नहीं होतीं, बल्कि जिंदगी से जंग जीतने की मिसाल बन जाती हैं। छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के छोटे से गांव बेलटुकरी के रहने वाले संजय डहरिया की कहानी भी ऐसी ही है। छह साल तक कैंसर जैसी घातक बीमारी से लड़ाई, चार बड़ी सर्जरी, लकवे जैसी पीड़ा और आर्थिक चुनौतियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी। जिंदगी ने जब-जब उन्हें गिराने की कोशिश की, उन्होंने और मजबूत होकर खड़े होने का फैसला किया।

गांव की मिट्टी से जन्मा बड़ा सपना

छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले के बेलटुकरी गांव में जन्मे संजय डहरिया का बचपन साधारण परिस्थितियों में बीता। उनके पिता किसान हैं और परिवार की आय सीमित थी। बावजूद इसके उनके माता-पिता ने हमेशा शिक्षा को सबसे बड़ा हथियार माना। संजय की शुरुआती पढ़ाई गांव के सरकारी स्कूल से हुई। बचपन से ही वह पढ़ाई में मेधावी थे और आगे बढ़ने का सपना देखते थे। इसी दौरान उनका चयन जवाहर नवोदय विद्यालय में हो गया, जहां से उन्होंने 12वीं तक की पढ़ाई पूरी की। नवोदय विद्यालय में पढ़ाई के दौरान उन्होंने पहली बार एक आईएएस अधिकारी को करीब से देखा। उसी पल उनके मन में यह सपना जागा कि एक दिन वह भी प्रशासनिक सेवा में जाएंगे और समाज के लिए काम करेंगे।

नौकरी के साथ जारी रखी सिविल सेवा की तैयारी

परिवार की आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं थी, इसलिए संजय ने पढ़ाई के साथ-साथ नौकरी करना शुरू कर दिया। 12वीं के बाद उन्होंने स्कूल में शिक्षक के रूप में पढ़ाना शुरू किया और साथ ही अपनी पढ़ाई जारी रखी। बाद में उन्होंने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया और इंडिया पोस्ट जैसी सरकारी संस्थाओं में भी काम किया। नौकरी के साथ तैयारी करना आसान नहीं था, लेकिन संजय ने अपने समय का बेहतर उपयोग किया। वह रोज छह से सात घंटे पढ़ाई के लिए निकालते थे। उनके लिए हर दिन एक संघर्ष था, लेकिन उन्होंने अपने सपने को कभी कमजोर नहीं पड़ने दिया। वह मानते थे कि अगर लक्ष्य स्पष्ट हो तो मुश्किल रास्ते भी मंजिल तक पहुंचा देते हैं।

जब जिंदगी ने दी सबसे बड़ी चुनौती: कैंसर से जंग

संजय की जिंदगी में सबसे कठिन दौर तब आया जब वर्ष 2012 में उन्हें कैंसर का पता चला। यह खबर किसी भी व्यक्ति को तोड़ सकती थी, लेकिन संजय ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। बीमारी के दौरान उन्हें लकवे जैसी गंभीर समस्या का भी सामना करना पड़ा। 2013 से 2015 के बीच उनकी चार बड़ी सर्जरी हुईं। इलाज के लंबे दौर में उन्हें कई शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों से गुजरना पड़ा। कई बार ऐसा लगा कि जिंदगी थम गई है, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। धीरे-धीरे उपचार के बाद उनकी सेहत में सुधार होने लगा। इसके बाद भी कई साल तक उन्हें नियमित मेडिकल जांच और फॉलो-अप से गुजरना पड़ा। लेकिन इन सभी कठिनाइयों के बीच उनके मन में एक ही सपना था—एक दिन यूपीएससी पास करना।

असफलता के बाद भी नहीं छोड़ा सपना

बीमारी से उबरने के बाद संजय ने फिर से अपने लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित किया। उन्होंने पहली बार वर्ष 2019 में यूपीएससी की परीक्षा दी, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। यह असफलता भी उनके लिए एक और चुनौती बन गई। कई लोग ऐसे मोड़ पर हार मान लेते हैं, लेकिन संजय ने अपने संघर्षों को याद किया और आगे बढ़ने का फैसला किया। उन्होंने 2022 में रायपुर जाकर पूरी तरह यूपीएससी की तैयारी शुरू की। इस दौरान उन्होंने दिन-रात मेहनत की और अपने लक्ष्य पर पूरा ध्यान केंद्रित किया। उनका विश्वास था कि अगर उन्होंने कैंसर जैसी बीमारी को हराया है तो यूपीएससी जैसी परीक्षा भी जीत सकते हैं।

38 की उम्र में मिली सफलता, बन गए प्रेरणा की मिसाल

साल 2025 में जब यूपीएससी का परिणाम घोषित हुआ तो संजय डहरिया का सपना सच हो गया। उन्होंने 946वीं रैंक हासिल की और प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गए। यह सफलता सिर्फ एक परीक्षा में सफलता नहीं थी बल्कि जिंदगी से लड़ी गई लंबी जंग की जीत थी। 38 साल की उम्र में हासिल की गई यह उपलब्धि उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई है जो किसी न किसी कठिनाई से जूझ रहे हैं। संजय की कहानी बताती है कि हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, अगर इंसान का हौसला मजबूत हो तो वह हर चुनौती को पार कर सकता है। उनका संदेश साफ है—सपनों को छोड़ना नहीं चाहिए, क्योंकि कभी-कभी मंजिल तक पहुंचने में थोड़ा समय जरूर लगता है, लेकिन मेहनत और विश्वास से हर सपना सच हो सकता है।

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