अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर जारी एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) की रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति की एक बड़ी सच्चाई सामने रख दी है। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में कुल 4,666 सांसदों और विधायकों में से केवल 464 यानी करीब 10 प्रतिशत महिलाएं हैं। यह आंकड़ा बताता है कि लोकतंत्र की सबसे अहम संस्थाओं में आज भी महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के मुकाबले काफी कम है।
महिला दिवस पर आई रिपोर्ट ने उठाए कई सवाल
अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जारी एक नई रिपोर्ट ने भारतीय राजनीति की तस्वीर पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) द्वारा जारी इस रिपोर्ट में देश की संसद और विभिन्न राज्य विधानसभाओं में महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक देशभर में कुल 4,666 सांसदों और विधायकों में से केवल 464 महिलाएं हैं। यानी भारतीय राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी करीब 10 प्रतिशत ही है। यह आंकड़ा बताता है कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी काफी सीमित है।
पुरुषों के मुकाबले महिलाओं की भागीदारी बेहद कम
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय राजनीति में पुरुषों का दबदबा अब भी साफ दिखाई देता है। संसद से लेकर राज्य विधानसभाओं तक ज्यादातर सीटों पर पुरुष नेता ही काबिज हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि राजनीतिक दलों द्वारा महिलाओं को कम टिकट देना, सामाजिक बाधाएं और चुनावी राजनीति की चुनौतियां इसके पीछे प्रमुख कारण हैं। ADR की रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं की भागीदारी में पिछले कुछ दशकों में बढ़ोतरी जरूर हुई है, लेकिन यह बढ़ोतरी अभी भी संतोषजनक नहीं मानी जा सकती।
किन राज्यों में ज्यादा महिला सांसद
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि कुछ राज्यों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी अपेक्षाकृत बेहतर है। आंकड़ों के मुताबिक पश्चिम बंगाल में सबसे ज्यादा 11 महिला सांसद हैं। इसके बाद उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में 7-7 महिला सांसद हैं, जबकि मध्य प्रदेश में 6 महिला सांसद हैं। यह आंकड़े दिखाते हैं कि कुछ राज्यों में महिलाओं को राजनीति में आगे आने के अवसर मिल रहे हैं, लेकिन पूरे देश के स्तर पर स्थिति अभी भी संतुलित नहीं है।
राजनीतिक दलों में महिलाओं की स्थिति
ADR की रिपोर्ट में राजनीतिक दलों के स्तर पर भी महिलाओं की भागीदारी का विश्लेषण किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार भारतीय जनता पार्टी (BJP) में सबसे ज्यादा 31 महिला सांसद हैं। इसके बाद कांग्रेस में 13 महिला सांसद और तृणमूल कांग्रेस (TMC) में 11 महिला सांसद हैं। विश्लेषण से यह भी सामने आया है कि चुनाव जीतने वाली ज्यादातर महिला उम्मीदवार राष्ट्रीय या राज्य स्तरीय राजनीतिक दलों से जुड़ी हुई थीं। दिलचस्प बात यह है कि किसी भी गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी या निर्दलीय महिला उम्मीदवार को चुनाव में जीत हासिल नहीं हुई।
पिछले दशकों में बढ़ी महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले कुछ दशकों में महिलाओं की राजनीतिक भागीदारी में धीरे-धीरे सुधार हुआ है। उदाहरण के तौर पर 1957 के लोकसभा चुनावों में केवल 45 महिला उम्मीदवार मैदान में उतरी थीं। लेकिन 18वें लोकसभा चुनाव में यह संख्या बढ़कर लगभग 800 तक पहुंच गई। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि अब अधिक महिलाएं राजनीति में प्रवेश करने के लिए तैयार हो रही हैं और उन्हें अवसर भी मिल रहे हैं।
संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व
संसद में महिलाओं की भागीदारी भी समय के साथ बढ़ी है। 1951 में लोकसभा में केवल 22 महिला सांसद थीं, जो कुल सदस्यों का लगभग 5 प्रतिशत थीं। वहीं 2024 में यह संख्या बढ़कर 74 हो गई, जो करीब 14 प्रतिशत के बराबर है। हालांकि यह सुधार सकारात्मक संकेत देता है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अभी भी महिलाओं का प्रतिनिधित्व लोकतांत्रिक संतुलन के लिहाज से पर्याप्त नहीं है।
स्थानीय निकायों में बेहतर स्थिति
दिलचस्प बात यह है कि स्थानीय स्तर पर महिलाओं की भागीदारी कहीं बेहतर दिखाई देती है। 2022 के आंकड़ों के अनुसार स्थानीय स्वशासन संस्थाओं में कुल 13,75,914 प्रतिनिधियों में से लगभग 44 प्रतिशत महिलाएं थीं। पंचायत और नगर निकायों में महिलाओं को आरक्षण मिलने की वजह से यहां उनका प्रतिनिधित्व काफी ज्यादा है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ संसद और विधानसभाओं में भी इसी तरह के कदम उठाने की जरूरत पर जोर देते हैं।
महिला आरक्षण बिल से उम्मीदें
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए महिला आरक्षण बिल को एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। सितंबर 2023 में संसद ने इस बिल को पास कर दिया था। इसके तहत संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत सीटें आरक्षित करने का प्रावधान किया गया है। हालांकि यह बिल अभी पूरी तरह लागू नहीं हुआ है। इसे लागू करने से पहले जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है। रिपोर्ट में कहा गया है कि 2026-27 में प्रस्तावित जनगणना समय पर होना बेहद जरूरी है, ताकि इस बिल को 2029 तक लागू किया जा सके।
क्या बदल पाएगी भारतीय राजनीति?
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर महिला आरक्षण बिल प्रभावी रूप से लागू हो जाता है तो भारतीय राजनीति में महिलाओं की भागीदारी में बड़ा बदलाव देखने को मिल सकता है। इससे संसद और विधानसभाओं में महिलाओं की आवाज मजबूत होगी और नीति-निर्माण में उनकी भूमिका भी बढ़ेगी। महिला नेताओं का कहना है कि राजनीति में महिलाओं की भागीदारी बढ़ना केवल प्रतिनिधित्व का सवाल नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता और लोकतांत्रिक मजबूती के लिए भी जरूरी है।
लोकतंत्र के लिए अहम सवाल
ADR की यह रिपोर्ट भारतीय लोकतंत्र के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करती है—क्या देश की राजनीति में महिलाओं को बराबरी का अवसर मिल पा रहा है? हालांकि पिछले दशकों में स्थिति में सुधार हुआ है, लेकिन अभी भी लंबा रास्ता तय करना बाकी है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब तक महिलाओं को पर्याप्त अवसर नहीं मिलेंगे, तब तक भारतीय लोकतंत्र का प्रतिनिधित्व पूरी तरह संतुलित नहीं कहा जा सकता।